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MCQ and Summary for स्वेदशी (Swadeshi) Class 10 Hindi Godhuli Part 2 Bihar Board

स्वेदशी - प्रेमघन प्रश्नोत्तर

Multiple Choice Question Solutions (बहुविकल्पी प्रश्न)

1. 'स्वदेशी' किस कवि की रचना है ?
(A) घनानंद
(B) सुमित्रानंदन पंत
(C) रामधारी सिंह 'दिनकर'
(D) प्रेमघन
उत्तर
(D) प्रेमघन

2. 'प्रेमघन' किसका उपनाम है ?
(A) सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन
(B) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
(C) बदरी नारायण चौधरी
(D) वीरेन डंगवाल
उत्तर
(C) बदरी नारायण चौधरी

3. प्रेमघन किस युग के कवि थे ?
(A) आदिकाल
(B) भक्तिकाल
(C) भारतेन्दु युग
(D) छायावादी युग
उत्तर
(C) भारतेन्दु युग

4. कवि 'प्रेमधन' के अनुसार भारत में आज कौन-सी वस्तु दिखाई नहीं पड़ती?
(A) भारतीयता
(B) कदाचारिता
(C) पत्रकारिता
(D) अंग्रेजी भाषा
उत्तर
(A) भारतीयता

5. आजकल भारत के लोग किस भाषा में बोलना पसन्द करते हैं ?
(A) हिन्दी
(B) मातृभाषा
(C) अंग्रेजी
(D) फ्रेंच
उत्तर
(C) अंग्रेजी

6. इन दिनों भारत के बाजार किन वस्तुओं से भरे पड़े हैं ?
(A) चीनी
(B) पाकिस्तानी
(C) विदेशी
(D) अफगानी
उत्तर
(C) विदेशी

7. भारत के लोगों को अब क्या भाने लगा है ?
(A) विदेशी रहन-सहन
(B) देसी घी
(C) परदेशी
(D) आतंक
उत्तर
(A) विदेशी रहन-सहन

8. प्रेमघन का जन्म 1855 ई० में कहाँ हुआ था ?
(A) मिर्जापुर में (उत्तर प्रदेश)
(B) बलिया (उत्तर प्रदेश)
(C) मसौढ़ा (बिहार)
(D) सतना (मध्य प्रदेश)
उत्तर
(A) मिर्जापुर में (उत्तर प्रदेश)

9. प्रेमघन की मृत्यु कब हुई ?
(A) 1911
(B) 1922
(C) 1933
(D) 1944
उत्तर
(A) 1911

10. प्रेमघन की पठित रचना का नाम है।
(A) विदेशी
(B) स्वदेशी
(C) पश्चाताप
(D) पद्मावती
उत्तर
(B) स्वदेशी

11. किस देश में हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई को देखकर पहचान करना मुश्किल है ?
(A) पाकिस्तान में
(B) बांग्लादेश में
(C) भारत में
(D) चीन में
उत्तर
(C) भारत में

12. भारतीय अब कैसे कपड़े पहनना पसंद करते हैं ?
(A) देशी
(B) पश्चिमी सभ्यता के
(C) आधुनिक फैशन के
(D) पुराने पहनावे (धोती-कुर्ता)
उत्तर
(C) आधुनिक फैशन के

13. भारतीय हिन्दू अब किस भाषा का प्रयोग कम करते हैं ?
(A) अंग्रेजी
(B) संस्कृत
(C) हिन्दी
(D) फारसी
उत्तर
(C) हिन्दी

14. भारत में कहीं भी क्या दृष्टिगोचर नहीं हो रही है ?
(A) पाश्चात्य संस्कृति
(B) भारतीयता
(C) आदि संस्कृति
(D) लोक लज्जा
उत्तर
(B) भारतीयता

15. आज भारतीयों की बुद्धि विदेशी क्यों हो गई है ?
(A) विदेशी भाषा पढ़कर
(B) धोती छोड़कर
(C) पतलून पहनने से
(D) संस्कृत छोड़ने से
उत्तर
(B) धोती छोड़कर

16. स्वदेशी कविता में किस बात का उल्लेख है ?
(A) देश-दशा
(B) दरिद्रता
(C) भावुकता
(D) कठोरता
उत्तर
(A) देश-दशा

17. भारतीयता की क्या पहचान है ?
(A) ढीले-ढाले धोती
(B) पतलून
(C) अचकनयुक्त पैजामा
(D) घाघरा
उत्तर
(A) ढीले-ढाले धोती

18. कवि ने 'स्वदेशी' कविता में ‘डफाली' किसे कहा है ?
(A) नृप को
(B) दास-वृत्ति की चाहने वाले को
(C) अंग्रेजों को
(D) दासों को
उत्तर
(B) दास-वृत्ति की चाहने वाले को

19. आज हिन्दुस्तानी कहाँ की बनी वस्तुओं से घृणा करने लगे हैं ?
(A) चीन निर्मित
(B) अमेरिका निर्मित
(C) इंग्लैंड निर्मित
(D) हिन्दुस्तान निर्मित
उत्तर
(B) अमेरिका निर्मित

20. हिन्दुस्तान के लोगों को क्या सुनकर लज्जा आने लगी है ?
(A) हिन्दुस्तानी होना
(B) जनता
(C) गरीब
(D) परतंत्र
उत्तर
(A) हिन्दुस्तानी होना

21. स्वदेशी कविता कब लिखी गई थी?
(A) स्वतंत्र काल में
(B) भारत की परतंत्रता काल में
(C) हड़प्पा सभ्यता में
(D) सभी सही हैं
उत्तर
(B) भारत की परतंत्रता काल में

22. आज की भारतीय जनता मेहनत से ज्यादा भरोसा किस चीज पर कर रही है ?
(A) चाकरी पर
(B) धर्म पर
(C) चोरी पर
(D) पलायनवाद पर
उत्तर
(A) चाकरी पर

23. 'प्रेमघन' अपना आदर्श किसे मानते थे ?
(A) महात्मा गाँधी
(B) विवेकानंद
(C) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(D) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
उत्तर
(D) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र


स्वेदशी- लेखक परिचय

प्रेमघन जी भारतेन्दु युग के महत्त्वपूर्ण कवि थे । उनका जन्म 1855 ई० में मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ और निधन 1922 ई० में। वे काव्य और जीवन दोनों क्षेत्रों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपना आदर्श मानते थे । वे निहायत कलात्मक एवं अलंकृत गद्य लिखते थे। उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया था। 1874 ई० में उन्होंने मिर्जापुर में ‘रसिक समाज’ की स्थापना की। उन्होंने ‘आनंद कादंबिनी’ मासिक पत्रिका तथा ‘नागरी नीरद’ नामक साप्ताहिक पत्र का संपादन किया । वे साहित्य सम्मेलन के कलकत्ता अधिवेशन के सभापति भी रहे । उनकी रचनाएँ ‘प्रेमघन सर्वस्व’ नाम से संग्रहीत हैं।

प्रेमघन जी निबंधकार, नाटककार, कवि एवं समीक्षक थे । ‘भारत सौभाग्य’, ‘प्रयाग रामागमन’ उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। उन्होंने ‘जीर्ण जनपद’ नामक एक काव्य लिखा जिसमें ग्रामीण जीवन का यथार्थवादी चित्रण है । प्रेमघन ने काव्य-रचना अधिकांशत: ब्रजभाषा और अवधी में की, किंतु युग के प्रभाव के कारण उनमें खड़ी बोलीं का व्यवहार और गद्योन्मुखता भी साफ दिखलाई पड़ती है । उनके काव्य में लोकोन्मुखता एवं यथार्थ-परायणता का आग्रह है । उन्होंने राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को अपना सहचर बनाया एवं साम्राज्यवाद तथा सामंतवाद का विरोध किया ।

‘प्रेमघन सर्वस्व’ से संकलित दोहों का यह गुच्छ ‘स्वदेशी’ शीर्षक के अंतर्गत यहाँ प्रस्तुत है। इन दोहों में नवजागरण का स्वर मुखरित है। दोहों की विषयवस्तु और उनका काव्य-वैभव इसके शीर्षक को सार्थकता प्रदान करते हैं । कवि की चिंता और उसकी स्वरभंगिमा आज कहीं
अधिक प्रासंगिक है।


स्वेदशी का सारांश (Summary)

भारत सौभाग्य तथा प्रयाग रामागमन इनके प्रसिद्ध नाटक हैं। इन्होनें ‘जीर्ण जनपद‘ नामक नाटक लिखा जिसमें ग्रामीण जीवन का यर्थाथवादी चित्रण है।
कविता परिचय- प्रस्तुत कविता ‘स्वदेशी‘ प्रेमघन द्वारा लिखित रचनाएँ ‘प्रेमघन सर्वस्व‘ से संकलित है। इन दोहों में नवजागरण का स्वर मुखरित है। दोहों की विषय-वस्तु और काव्य वैभव कविता के स्वदेशी भाव को स्पष्ट करते हैं। कवि की चिंता आज के परिवेश में भी प्रासंगिक है।


सबै बिदेसी वस्तु नर, गति रति रीत लखात।
भारतीयता कछु न अब भारत म दरसात।।
कवि प्रेमघन कहते हैं कि पराधीनता के कारण सर्वत्र विदेशी वस्तुएँ ही दिखाई पड़ती हैं। लोगों के चाल-चलन तथा रीति-रिवाज बदल गए हैं। दुःख है कि लोगों में भारतीयता की भावना मर गई है। देश-प्रेम की भावना देश में कहीं भी दिखाई नहीं देती।


नुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान।
मुसल्मान, हिंदू किधौं, कै हैं ये क्रिस्तान।।
पढ़ि विद्या परदेश की, बुद्धि विदेशी पाय।
चाल-चलन परदेश की, गई इन्हैं अति भाय।।
कवि कहता है कि अंग्रजी शासनकाल में हिंदु-मुसलमान दोनों के रहन-सहन, खान-पान, विद्या-व्यवसाय, चाल-चलन तथा आचरण बदल गए हैं। विदेशी भाषा पढ़ने के कारण अपनी संस्कृति, भाषा सबका त्याग कर विदेशी चाल-चलन अपना लिए हैं।

 
ठटे विदेशी ठाट सब, बन्यो देश विदेस।
सपनेहूँ जिनमें न कहुँ, भारतीयता लेस।।
बोलि सकत हिंदी नहीं, अब मिलि हिंदू लोग।
अंगरेजी भाखन करत, अंग्रेजी उपभोग।।
कवि ‘प्रेमघन‘ देश की दुर्दशा देखकर कहते हैं कि अंग्रेजी शासन के कारण भारतीयों का संस्कार विदेशी हो गया है। स्वदेशी वस्तुएँ नष्ट कर दी गई हैं। विदेशी वस्तुओं तथा भाषा के प्रचार के कारण कहीं भी भारतीयता के लक्षण दिखाई नहीं पड़ते। सभी अपनी सुख-सुविधा के प्राप्ति के लिए अंग्रजी भाषा का व्यवहार करते हैं।


अंगरेजी बाहन, बसन, वेष रीति औ नीति।
अंगरेजी रुचि, गृह, सकल, बस्तु देस विपरित।।
हिन्दुस्तानी नाम सुनि, अब ये सकुचि लजात।
भारतीय सब वस्तु ही, सों ये हाय घिनात।।
कवि ‘प्रेमघन‘ जी कहते हैं कि अंग्रेजी शासनकाल में भारतीयों की मनोदशा इतनी दूषित हो गई है कि वे भारतीय वस्तुओं का उपयोग करना छोड़ विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने लगे हैं। इनका हर कुछ विदेशी रंग में रंग चूका है। वे अपने को हिंदुस्तानी कहने में संकुचित महसुस करते हैं तथा स्वदेशी वस्तु देखकर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।


देस नगर बानक बनो, सब अंगरेजी चाल।
हाटन मैं देखहु भरा, बसे अंगरेजी माल।।
जिनसों सम्हल सकत नहिं तनकी, धोती ढीली-ढीली।
देस प्रंबध करिहिंगे वे यह, कैसी खाम खयाली।।
कवि कहते हैं कि भारतीय हाट-बाजारों में अंग्रेजी भर दिए गये हैं। भारतीय इन वस्तुओं के व्यवसायी बन गए। देश में निर्मित वस्तुओं का लोप हो गया है। देश की कमान वैसे लोगों के हाथ में है, जों स्वयं ढुलमुल विचार के हैं, जिन्हें स्वयं पर भरोसा नहीं है।


दास-वृति की चाह चहूँ दिसि चारहु बरन बढ़ाली।
करत खुशामद झूठ प्रशंसा मानहुँ बने डफाली।।
कवि आश्चर्य प्रकट करते हुए कहते हैं कि ऐसे खोटे विचार वालों से देश की सुरक्षा का आशा करना कितना हास्यपद है। क्योंकि सभी जाति के लोग अपनी आजीविका के लिए खुशामद में झूठी प्रशंसा का ढोल पीटने लगे हैं।

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