कंचा सार वसंत भाग - 1 (Summary of Kancha Vasant)

इस कहानी में लेखक श्री टी० पद्मनाभन ने बालजीवन का सुंदर चित्रण किया है| कैसे एक बालक अपने खेलने के सामान बाकी अन्य चीज़ों से ऊपर रखता है और किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता| अप्पू हाथ में बस्ता लटकाए नीम के पेड़ों की घनी छाया से गुजर रहा था। वह सियार, कौए की कहानी का मन-ही-मन मज़ा ले रहा था। वह चलते-चलते एक दुकान पर पहुँचा जहाँ अलमारी में काँच के ज़ार रखे थे। कंचे सफ़ेद गोल बड़े आँवले जैसे दिख रहे थे। वह कंचे को देखते-दखते उसमें खो गया।

वह कंचे लेना चाहता था लेकिन स्कूल की घंटी सुनते ही दौड़ पड़ा। स्कूल में देरी से आने पर वह सबसे पीछे बैठा। उसके सहपाठी रामन, मल्लिका, अम्मू आदि आगे बैठे थे। जार्ज जो उसका सहपाठी था, आज बुखार होने के कारण स्कूल नहीं आया था। वह उसके बारे में सोचने लगा क्योंकि वह कंचे का अच्छा खिलाड़ी था। मास्टर साहब उस समय रेलगाड़ी के बारे में पढ़ा रहा था परंतु अप्पू का ध्यान पढ़ाई में नहीं था। वह अभी भी कंचे के बारे में सोच रहा था। इतने में ही उसे एक चॉक का टुकड़ा आ लगा और वह खड़ा हो गया। मास्टर जी उसके पास आकर डाँटने लगे। मास्टर जी उसका चेहरा देखकर समझ गए कि इसका ध्यान कहीं और था। उन्होंने अप्पू से प्रश्न पूछा जिसका जवाब वह नहीं दे पाया। मास्टर जी ने उसे बेंच पर खड़ा कर दिया। सभी बच्चे उसकी हँसी उड़ा रहे थे। वह रोने लगा। बेंच पर खड़ा अप्पू अभी भी कंचों के बारे में ही सोच रहा था। वह सोच रहा था कि जॉर्ज के आने पर कंचे खेलेगा। जॉर्ज के साथ वह दुकानदार के पास जाएगा।

मास्टर जी अपना घंटा समाप्त कर चले गए। अप्पू अब भी यही सोच रहा था कि कंचे कैसे लिए जाएँ। मास्टर जी ने सब बच्चों को फीस भरने के लिए कहा। सब बच्चे अपनी | फ़ीस भरने क्लर्क के पास चले गए। मास्टरजी के कहने पर अप्पू भी बेंच से उतरकर फीस भरने गया। बच्चे एक-एक करके फीस भरने लगे। ज्यादातर बच्चों ने फ़ीस भर दिया लेकिन अप्पू अभी भी कंचे के बारे में सोच रहा था। घंटी बजने पर सभी बच्चे कक्षा में आ गए।

शाम को वह इधर-उधर घूमता रहा। मोड़ पर उसी दुकान पर पहुँचकर वह शीशे के जार में रखे कंचे देखने लगा। उसने अपनी फ़ीस के एक रुपया पचास पैसे के उस दुकानदार से कंचे खरीद लिए। जब वह कंचे लेकर घर आ रहा था तो रास्ते में उसे देखने के लिए जैसे ही कागज़ की पुड़िया खोला तो सारे कंचे बिखर गए। अब वह उन्हें चुनने लगा। अपनी किताबें बाहर निकाल वह कंचे बस्ते में डालने लगा। वह उसे चुनने लगा तभी एक गाड़ी आई और वहाँ रुक गई। गाड़ी की ड्राइवर को अप्पू पर बहुत गुस्सा आया पर उसे खुश देख वह मुसकराकर चला गया। जब अप्पू घर पहुँचा और माँ को कंचा दिखाया तो माँ इतने सारे कंचे देखकर हैरान हो गई| अप्पू ने बताया कि वह फ़ीस के पैसों से ये कंचे खरीद लाया है। माँ ने कहा कि अब खेलोगे किसके साथ? यह कहकर माँ रोने लगी क्योंकि उसकी एक बहन थी मुन्नी, जो अब दुनिया में नहीं रही थी। तब अप्पू ने माँ से पूछा कि आपको कंचे अच्छे नहीं लगे। माँ उसकी भावनाओं को समझ गई और हँसकर बोली बहुत अच्छे हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ -

• केंद्रित - स्थिर 
• छाँव - छाया
• नौ दो ग्यारह होना - भाग जाना
• जार - काँच के डिब्बे 
• कतार - पंक्ति
• आकृष्ट - आकर्षित
• टुकर-टुकर ताकना - टकटकी लगाकर देखना
• निषेध में - मना करना 
• थामे - पकड़े
• मात खाना - हार जाना
• आँखों में चिंगारियाँ सुलगना - बहुत अधिक क्रोधित होना
• सुबकना - धीमी आवाज में रोना
• चिकोटी - चुटकी
• सींखचे - लकड़ी के पट्टे
•  रकम - पैसे
• पोटली - थैली
• गुस्सा हवा होना - गुस्सा शांत हो जाना
• काहे - क्यों


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