MCQ and Summary for नौबतखाने में इबादत (Naubatkhane me Ibadat) Class 10 Hindi Godhuli Part 2 Bihar Board

नौबतखाने में इबादत - यतीन्द्र मिश्र MCQ and सारांश

Multiple Choice Question Solutions (बहुविकल्पी प्रश्न)

1. नौबतखाने में इबादत' पाठ के लेखक कौन हैं ?
(A) विनोद कुमार शुक्ल
(B) यतीन्द्र मिश्र
(C) अशोक वाजपेयी
(D) अमर कांत
उत्तर
(B) यतीन्द्र मिश्र

2. बिस्मिल्ला खाँ का असली नाम क्या था ?
(A) शम्सुद्दीन
(B) सादिक हुसैन
(C) पीरबख्श
(D) अमीरुद्दीन
उत्तर
(D) अमीरुद्दीन

3. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कहाँ हुआ था ?
(A) काशी में
(B) दिल्ली में
(C) डुमराँव में
(D) पटना में
उत्तर
(C) डुमराँव में

4. बिस्मिल्ला खाँ रियाज के लिए कहाँ जाते थे ?
(A) बालाजी मंदिर
(B) संकटमोचन
(C) विश्वनाथ मंदिर
(D) दादा के पास
उत्तर
(A) बालाजी मंदिर

5. 'नरकट' का प्रयोग किस वाद्य-यंत्र में होता है ?
(A) शहनाई
(B) मृदंग
(C) ढोल
(D) बिगुल
उत्तर
(A) शहनाई

6. भारत सरकार ने विस्मिल्ला खाँ को किस सम्मान से अलंकृत किया ?
(A) बिहार रल
(B) भारत रत्न
(C) वाद्य रत्न
(D) शहनाई रत्न
उत्तर
(B) भारत रत्न

7. बिस्मिल्ला खाँ के पिता का क्या नाम था ?
(A) उस्ताद
(B) पैगम्बर
(C) बश
(D) उस्ताद पैगम्बर बख्श खाँ
उत्तर
(D) उस्ताद पैगम्बर बख्श खाँ

8. अमरुद्दीन भागे चलकर किस नाम में 'व्यात हुआ?
(A) बिरजू महाराज
(B) ला महाराज
(C) भिरिमल्ला खाँ
(D) इनमें सभी
उत्तर
(C) भिरिमल्ला खाँ

9. यतीन्द्र मिश्र का अयोध्या से क्या संबंध है?
(A) राम जन्म भूमि को लेकर
(B) लेखक की जन्म स्थली के कारण
(C) उत्तर प्रदेश का प्राचीन शहर के कारण
(D) त्रिवेणी तट के कारण
उत्तर
(B) लेखक की जन्म स्थली के कारण

10. नौबतखाने में इबादत साहित्य की कौन-सी विधा है ?
(A) निबंध
(B) कहानी
(C) व्यक्तिचित्र
(D) साक्षात्कार
उत्तर
(C) व्यक्तिचित्र

11. विस्मिल्ला खां के साथ किस मुस्लिम पर्व का नाम गुड़ा हुआ है ?
(A) ईद
(B) बकरीद
(C) शबे बारात
(D) मुहर्रम
उत्तर
(D) मुहर्रम


नौबतखाने में इबादत- लेखक परिचय

यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या, उत्तरप्रदेश में हुआ । उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी भाषा और साहित्य में एम० ए० किया । वे साहित्य, संगीत, सिनेमा, नृत्य और चित्रकला के जिज्ञासु अध्येता हैं । वे रचनाकार के रूप में मूलतः एक कवि हैं । उनके अबतक तीन काव्य-संग्रह : ‘यदा-कदा’, ‘अयोध्या तथा अन्य कविताएँ’, और ‘ड्योढ़ी पर आलाप’ प्रकाशित हो चुके हैं । कलाओं में उनकी गहरी अभिरुचि है । इसका ही परिणाम है कि उन्होंने प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साधना पर एक पुस्तक ‘गिरिजा’ लिखी । भारतीय नृत्यकलाओं पर विमर्श की पुस्तक है ‘देवप्रिया’, जिसमें भरतनाट्यम और ओडिसी की प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मान सिंह से यतींद्र मिश्र का संवाद संकलित है। यतींद्र मिश्र ने स्पिक मैके के लिए ‘विरासत 2001’ के कार्यक्रम के लिए. रूपंकर कलाओं पर केंद्रित पत्रिका ‘थाती’ का संपादन किया है। संप्रति, वे अर्द्धवार्षिक पत्रिका ‘सहित’ का संपादन कर रहे हैं । वे साहित्य और कलाओं के संवर्धन एवं अनुशीलन के लिए एक सांस्कृतिक न्यास ‘विमला देवी फाउंडेशन’ का संचालन 1999 ई० से कर रहे हैं।

यतींद्र मिश्र ने रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि द्विजदेव की ग्रंथावली का सह-संपादन भी किया है। उन्होंने हिंदी के प्रसिद्ध कवि कुँवरनारायण पर केंद्रित दो पुस्तकों के अलावा हिंदी सिनेमा के जाने-माने गीतकार गुलजार की कविताओं का संपादन ‘यार जुलाहे’ नाम से किया है। यतींद्र मिश्र को अबतक भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद् युवा पुरस्कार, राजीव गाँधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार, रजा पुरस्कार, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान आदि कई पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। उन्हें केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली और सराय, नई दिल्ली की फेलोशिप भी मिली है।

‘नौबतखाने में इबादत’ प्रसिद्ध शहनाईवादक भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर रोचक शैली में लिखा गया व्यक्तिचित्र है । इस पाठ में बिस्मिल्ला खाँ का जीवन – उनकी रुचियाँ, अंतर्मन की बुनावट, संगीत की साधना आदि गहरे जीवनानुराग और संवेदना के साथ प्रकट हुए हैं।


नौबतखाने में इबादत- पाठ परिचय

रस्तुत पाठ ’नौबतखाने में इबादत’ प्रसिद्ध शहनाई वादक भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर रोचक शैली में लिखा गया व्यक्तिचित्र है। इस पाठ में बिस्मिल्ला खाँ का जीवन- उनकी रुचियाँ, अंतर्मन की बुनावट, संगीत की साधना आदि गहरे जीवनानुराग और संवेदना के साथ प्रकट हुए हैं।


नौबतखाने में इबादत का सारांश (Summary)

प्रस्तुत पाठ ’नौबतखाने में इबादत’ में शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की जीवनचर्या का उत्कृष्ट वर्णन किया गया है। इन्होंने किस प्रकार शहनाई वादन में बादशाहत हासिल की, इसी का लेखा-जोखा इस पाठ में है। 1916 ई० से 1922 ई० के आसपास काशी के पंचगंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर के ड्योढ़ी के उपासना-भवन से शहनाई की मंगलध्वनि निकलती है। उस समय बिस्मिल्ला खाँ छः साल के थे। उनके बड़े भाई शम्सुद्दीन के दोनों मामा अलीबख्श तथा सादिक हुसैन देश के प्रसिद्ध सहनाई वादक थे।
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म डुमराँव (बिहार) में एक संगीत-प्रमी परिवार में 1916 ई0 में हुआ। इनके बचपन का नाम कमरूद्दीन था। –वह छोटी उम्र में ही अपने ननिहाल काशी चले गये और वहीं अपना अभ्यास शुरू किया। 14 साल की उम्र में जब वह बालाजी के मंदिर के नौबतखाने में रियाज के लिए जाते थे, तो रास्ते में रसूलनबाई और बतूलनबाई का घर था। इन्होंने अनेक साक्षात्कारों में कहा है कि इन्ही दोनों गायिकी-बहनों के गीत से हमें संगीत के प्रति आसक्ति हुई।
शहनाई को ’शाहनेय’ अर्थात् ’सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि दी गई है। अवधी पारंपरिक लोकगीतों और चैती में शहनाई का उल्लेख बार-बार मिलता
बिस्मिल्ला खाँ 80 वर्षों से सच्चे सुर की नेमत माँग रहें हैं तथा इसी की प्राप्ति के लिए पाँचों वक्त नमाज और लाखों सजदे में खुदा के नजदिक गिड़गिड़ाते हैं। उनका मानना है कि जिस प्रकार हिरण अपनी नाभि की कस्तूरी की महक को जंगलों में खोजता फिरता है, उसी प्रकार कमरूद्दीन भी यहीं सोचते आया है कि सातों सुरों को बरतने की तमीज उन्हें सलीके से अभी तक क्यों नहीं आई।
बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई के साथ जिस मुस्लिम पर्व का नाम जुड़ा है, वह मुहर्रम है। इस पर्व के अवसर पर हजरत इमाम हुसैन और उनके कुछ वंशजों के प्रति दस दिनों तक शोक मनाया जाता है। इस शोक के समय बिस्मिल्ला खाँ के खानदान का कोई भी व्यक्ति न तो शहनाई बजाता है और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में भाग लेता है।
आठवीं तारीख खाँ साहब के लिए खास महत्त्व की होती थी। इस दिन वे खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंडी से फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते थे।
बिस्मिल्ला खाँ अपनी पुरानी यादों का स्मरण करके खिल उठते थे। बचपन में वे फिल्म देखने के लिए मामू, मौसी तथा नानी से दो-दो पैसे लेकर सुलोचना की नई फिल्म देखने निकल पड़ते थे।
बिस्मिल्ला खाँ मुस्लमान होते हुए भी सभी धर्मों के साथ समान भाव रखते थे। उन्हें काशी विश्वनाथ तथा बालाजी के प्रति अपार श्रद्धा थी। काशी के संकटमोचन मन्दिर में हनुमान जयन्ती के अवसर पर वे शहनाई अवश्य बजाते थे। काशी से बाहर रहने पर वे कुछ क्षण काशी की दिशा में मुँह करके अवश्य बजाते थे।
उनका कहना था – ’क्या करें मियाँ, काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मन्दिर यहाँ।’ काशी को संगीत और नृत्य का गढ़ माना जाता है। काशी में संगीत, भक्ति, धर्म, कला तथा लोकगीत का अद्भुत समन्वय है। काशी में हजारों सालों का इतिहास है जिसमें पंडित कंठे महाराज, विद्याधरी, बड़े रामदास जी और मौजद्दिन खाँ थे।
बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई एक दुसरे के पर्याय हैं। बिस्मिल्ला खाँ का मतलब बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई।
एक शिष्या ने उनसे डरते-डरते कहा- ’बाबा आपको भारतरत्न मिल चूका है, अब आप फटी लुंगी न पहना करें।’ तो उन्होंने कहा- ’भारतरत्न हमको शहनाई पर मिला है न कि लुंगी पर। लुंगीया का क्या है, आज फटी — है तो कल सिल जाएगी। मालिक मुझे फटा सूर न बक्शें।
निष्कर्षतः बिस्मिल्ला खाँ काशी के गौरव थे। उनके मरते ही काशी में । संगीत, साहित्य और अदब की बहुत सारी परम्पराएँ लुप्त हो चुकी हैं। वे दो कौमों के आपसी भाईचारे के मिसाल थे। खाँ साहब शहनाई के बादशाह थे। यही कारण है कि इन्हें भारत रत्न, पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा अनेक विश्वविद्यालय की मानद उपाधियाँ मिलीं। वे नब्बे वर्ष की आयु में 21 अगस्त, 2006 को खुदा के प्यारे हो गए।

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