हम पंछी उन्मुक्त गगन के वसंत भाग - 1 (Summary of Hum Panchi Unmukt Gagan Ke Vasant)

यह कविता कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ द्वारा लिखी गयी है जिसमें कवि ने पक्षियों के माध्यम से स्वतंत्रता के मायने समझाए हैं| 

पक्षी कह रहे हैं कि हम खुले आकाश में रहते हैं। यदि हमें पिंजड़े में बन्द कर दिया गया तो हम अपना मधुर गीत नहीं गा पाएँगे। सोने के पिंजरे में भी खुशी से फड़फड़ाते हमारे पंख उससे टकरा कर टूट जाएँगे|

पक्षियाँ कहती हैं हमें नदियों और झरनों का बहता जल पीना पसंद है, पिंजड़े के अन्दर हमारी भूख-प्यास नहीं मिटेगी| हमें आज़ाद रहकर कड़वे नीम का फल खाना, गुलामी में रहकर सोने की कटोरी में मैदा खाने से ज्यादा पसंद है|


पक्षियाँ कहती हैं सोने की जंजीरों के बंधन में रहकर हम अपनी चाल और उड़ने का ढंग सब भूल जाएँगें। हम तो वृक्ष की ऊँची डालियों पर झूला झूलना का सपना देखते हैं|


पक्षियों की इच्छा खुले नीले आसमान में उड़ने की है। उड़ते हुए वे आसमान की सीमा को छूना चाहते हैं। वे अपनी चोंच से आसमान के तारों जैसे अनार के दानों को चुगना चाहते हैं।

आसमान में उड़ते हुए पक्षियों में एक होड़-सी लग जाती है| वे आसमान की उस सीमा को छु लेना चाहते हैं, जिसका कोई अंत नहीं है। वे यही इच्छा लेकर आसमान में उड़ते हैं कि या तो वे मंजिल को प्राप्त ही कर लेंगे या फिर मंज़िल पाने की चाह में उनकी साँसें ही उखड़ जाएगी अर्थात् वे मर जाएँगे।

कठिन शब्दों के अर्थ -

• उन्मुक्त - खुला, बंधन रहित
• गगन - आसमान
• पुलकित - प्रसन्नता से भरे
• कनक - सोना
• कटुक - कड़वी
• निबौरी - नीम का फल
• कनक-कटोरी - सोने से बना बर्तन
• स्वर्ण - सोना
• श्रृंखला - जंजीरें
• तरु - पेड़
• फुनगी - वृक्ष का सबसे ऊपरी भाग
• तारक - तारे
• सीमाहीन - असीमित
• क्षितिज - जहाँ धरती और आसमान परस्पर मिलते हुए प्रतीत होते हैं
• होड़ा-होड़ी - आगे बढ़ने की प्रतियोगिता


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