NCERT Solutions for Class 11th: पाठ 3 - उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण - एक समीक्षा

NCERT Solutions for Class 11th: पाठ 3 - उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण - एक समीक्षा (Udarikaran, Nijikaran aur Vaishvikaran - Ek Samiksha) Bhartiya Arthvyavastha Ka Vikash

अभ्यास

पृष्ठ संख्या: 55

1. भारत में आर्थिक सुधार क्यों आरंभ किए गए?

उत्तर

भारत में विदेशी ऋणों के मामले में संकट का निपटने के लिए 1991 में आर्थिक सुधार आरंभ किए गए:
• अर्थव्यवस्था के नियमन और नियंत्रण के लिए इतने अधिक नियम-कानून बनाए गए कि उनसे आर्थिक संवृद्धि और विकास की समूची प्रक्रिया ही अवरुद्ध हो गई| राष्ट्रीय आय 0.8% की दर से बढ़ रही थी|
• भारत एक ऋणी देश था और सरकार विदेशी ऋणों के भुगतान करने की स्थिति में नहीं थी|
• विदेशी मुद्रा रिजर्व आवश्यक आयात का भुगतान करने के योग्य भी नहीं बचा था|
• मुद्रा स्फीति का स्तर 16.8% तक पहुँच गया, जो अंततः आवश्यक वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि करता है|
• भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक से 7 बिलियन डॉलर का ऋण लिया| दबाव में आकर सरकार को उदारीकरण की नीति अपनानी पड़ी|

2. विश्व व्यापार संगठन का सदस्य होना क्यों आवश्यक है?

उत्तर

किसी देश का विश्व व्यापार संगठन का सदस्य होना निम्न कारणों से आवश्यक है:
• विश्व व्यापार संगठन का प्रमुख उद्देश्य सभी देशों को विश्व व्यापार में समान अवसर उपलब्ध कराना है|
• विश्व व्यापार संगठन का ध्येय ऐसी नियम आधारित व्यवस्था की स्थापना है, जिसमें कोई देश मनमाने ढंग से व्यापार के मार्ग में बाधाएँ खड़े नहीं कर पाए|
• साथ ही इसका ध्येय सेवाओं के सृजन और व्यापार को प्रोत्साहन भी देना है ताकि विश्व के संसाधनों का इष्टतम स्तर पर प्रयोग हो और पर्यावरण का भी संरक्षण हो सके|
• विश्व व्यापार संगठन सभी सदस्य देशों के प्रशुल्क और अप्रशुल्क अवरोधकों को हटाकर तथा अपने बाजारों को सदस्य देशों के लिए खोलकर द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार को बढ़ाने हेतु इसमें वस्तुओं और सेवाओं के साथ-साथ विनिमय को भी स्थान देता है|

3. भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय क्षेत्र में नियंत्रक की भूमिका से अपने को सुविधाप्रदाता की भूमिका अदा करने में क्यों परिवर्तित किया?

उत्तर

उदारीकरण के बाद, भारतीय रिजर्व बैंक को नियंत्रक की भूमिका से हटाकर उसे सुविधाप्रदाता की भूमिका अदा करने में परिवर्तित किया जिसका अर्थ है कि वित्तीय क्षेत्रक रिजर्व बैंक से सलाह किए बिना ही कई मामलों में अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र हो जाएगा|

4. रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों पर किस तरह नियंत्रण रखता है?

उत्तर

भारत में सभी बैंक रिजर्व बैंक के मानदंडों और नियमों के द्वारा नियंत्रित होते हैं| यह व्यावसायिक बैंकों के सांविधिक तरलता अनुपात (SLR), नकद आरक्षित अनुपात (CRR), बैंक दर, मूल उधार दर (PLR), रेपो दर, रिवर्स रेपो दर और ब्याज दरों को तय करता है| ये सभी अनुपात और दर रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित किए जाते हैं तथा सभी व्यावसायिक बैंकों के लिए इन दरों का पालन करना या बनाए रखना अनिवार्य है|

5. रूपयों के अवमूल्यन से आप क्या समझते हैं?

उत्तर

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रचलित मुद्रा के तुलना में रूपये के मूल्य को घटना रूपये का अवमूल्यन कहलाता है| इसका अर्थ यह होता है कि रूपये का मूल्य गिर गया है तथा विदेशी मुद्रा का मूल्य बढ़ गया है|

6. इनमें भेद करें:
(क) युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय
(ख) द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार
(ग) प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधक

उत्तर

(क)

युक्तियुक्त विक्रय
अल्पांश विक्रय
युक्तियुक्त विक्रय का अर्थ निजी क्षेत्र के लिए सार्वजनिक क्षेत्र का 51% या उससे अधिक हिस्सेदारी है जो उच्चतम बोली लगाता है| अल्पांश विक्रय का अर्थ निजी क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र की एक इकाई की 49% से कम की हिस्सेदारी के विक्रय के लिए है|
सार्वजनिक क्षेत्र का स्वामित्व निजी क्षेत्र को सौंप दिया जाता है| सार्वजनिक क्षेत्र का स्वामित्व सरकार के पास ही रहता है क्योंकि इसमें 51% की हिस्सेदारी है|

(ख)

द्विपक्षीय व्यापार
बहुपक्षीय व्यापार
यह दो देशों के बीच व्यापारिक समझौता है| यह दो से अधिक देशों के बीच का व्यापारिक समझौता है|
यह एक ऐसा समझौता है जो दोनों देशों के लिए समान अवसर प्रदान करता है| यह एक ऐसा समझौता है जो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सभी सदस्य देशों को समान अवसर प्रदान करता है

(ग)

प्रशुल्क अवरोधक
अप्रशुल्क अवरोधक
यह किसी देश द्वारा अपने घरेलू उद्योगों के संरक्षण के लिए आयात पर लगाए गए कर से संबंधित है यह करों के अलावा अन्य प्रतिबंधों से संबंधित है, जिसे आयात पर लगाया जाता है|
इसमें सीमा-शुल्क तथा निर्यात-आयात शुल्क शामिल हैं| इसमें कोटा और लाइसेंस शामिल हैं|
यह भौतिक इकाईयों (जैसे प्रति टन) या आयातित वस्तुओं के मूल्य पर लगाया जाता है| यह आयातित वस्तुओं की मात्रा और गुणवत्ता पर लगाया जाता है|

7. प्रशुल्क क्यों लगाए जाते हैं?

उत्तर

प्रशुल्क, आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर है| प्रशुल्क लगाने पर आयातित वस्तुएँ अधिक महँगी हो जाती है, जो वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित करती है| यह घरेलू उत्पादित वस्तुओं का संरक्षण करता है|

8. परिमाणात्मक प्रतिबंधों का क्या अर्थ होता है?

उत्तर

परिमाणात्मक प्रतिबन्ध किसी देश द्वारा आयातित या निर्यात किए जाने वाले वस्तुओं की मात्रा पर विशिष्ट सीमाएँ लगाते हैं| यह कोटा, एकाधिकार या किसी अन्य रूप में हो सकते हैं|

9. ‘लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर देना चाहिए’? क्या आप इस विचार से सहमत हैं? क्यों?

उत्तर

लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण नहीं करना चाहिए क्योंकि ये सरकार के लिए राजस्व प्राप्ति के साधन हैं| यदि कोई सार्वजनिक उपक्रम अकुशल तथा घटे की स्थिति में चल रहे हैं तो वे सरकार के लिए राजस्व के कमी का कारन बनती है तथा इससे बजट घाटे की संभावना बढ़ती है| घटे में चल रहे उपक्रमों का निजीकरण कर देना चाहिए| इसके अतिरिक्त कई ऐसे सार्वजनिक उपक्रम जैसे, जल विभाग, रेलवे आदि राष्ट्र के हित को बढ़ावा देते हैं और आम नागरिक को कम मूल्य पर उपलब्ध किये जाते हैं| ऐसे उपक्रमों के निजीकरण से आम नागरिकों के हित को नुकसान पहुँचता है| इस प्रकार, कम लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों का ही निजीकरण करना चाहिए| लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के स्थान पर, सरकार अपने कार्यों में अधिक स्वायत्तता तथा जिम्मेदारी बढ़ा सकती है, जो न केवल उनकी उत्पादकता और दक्षता में वृद्धि करेगा बल्कि अपने निजी समकक्षों के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ाएगा|

10. क्या आपके विचार में बाह्य प्रापण भारत के लिए अच्छा है? विकसित देशों में इसका विरोध क्यों हो रहा है?

उत्तर

भारत के लिए बाह्य प्रापण अच्छा है, क्योंकि:
• रोजगार का सृजन: भारत जैसे विकासशील देश के लिए रोजगार सृजन एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है और बाह्य प्रापण रोजगार के अवसरों को पैदा करता है| यह नए और उच्च भुगतान वाले नौकरियों का नेतृत्व करती है|
• तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान: बाह्य प्रापण, विचारों का आदान-प्रदान और तकनीकी जानकारी तथा विकसित देशों से उन्नत प्रौद्योगिकी को परिष्कृत करने में सक्षम बनाता है|
• अंतर्राष्ट्रीय योग्यता: बाह्य प्रापण से भारत की अंतर्राष्ट्रीय योग्यता की विश्वसनीयता बढ़ जाती है| इससे भारत में निवेश का प्रवाह भी बढ़ जाता है|
• अन्य क्षेत्रों को प्रोत्साहन: बाह्य प्रापण न केवल सेवा क्षेत्रकों के लिए लाभकारी है बल्कि यह दूसरे संबंधित क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र जैसे अन्य संबंधित क्षेत्रों को विभिन्न पिछड़े और अगले संबंधों के माध्यम से भी प्रभावित करता है|
• मानव पूँजी निर्माण में योगदान: बाह्य प्रापण प्रशिक्षण के द्वारा मानव-पूँजी के निर्माण तथा विकास में मदद करता है, उन्नत कौशल प्रदान करता है जिससे उनके भविष्य के अवसरों में तथा उच्च पदों वाले नौकरियों के लिए उनकी योग्यता बढ़ जाती है|
• उच्च जीवन स्तर तथा गरीबी का उन्मूलन: उच्च भुगतान वाले नौकरियों का सृजन करके बाह्य प्रापण विकासशील देशों के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाता है| यह गरीबी के उन्मूलन में भी सहायक है|
विकसित देशों में बाह्य प्रापण का विरोध हो रहा है क्योंकि इससे विकसित देशों के निवेश और फंड का प्रवाह विकासशील देशों में होने लगता है| इसके अलावा, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, मेजबान देशों के स्वतंत्रता के लिए एक अन्तर्निहित खतरा, लंबे समय तक होता है| यह उन देशों में बेरोजगारी भी पैदा करता है जहाँ यह स्थित होता है|

11. भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण यह विश्व का बाह्य प्रापण केंद्र बन रहा है| अनुकूल परिस्थितियाँ क्या हैं?

उत्तर

कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ जिनके कारण भारत विश्व का बाह्य प्रापण केंद्र बन रहा है:
• सस्ते श्रमिकों की आसानी से उपलब्धता: अन्य विकसित देशों के तुलना में भारत में मजदूरी दर बहुत कम है, जिसके कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यापार के बाह्य प्रापण के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य पाया|
• कौशल: भारतीयों के पास उचित मात्रा में कौशल और तकनीकी ज्ञान के रूप में अंतर्राष्ट्रीय भाषा, अंग्रेजी का ज्ञान उपलब्ध है|
• स्थिर राजनितिक वातावरण: भारत में लोकतांत्रिक राजनीतिक वातावरण बहुराष्ट्रीय कंपनियों को विस्तार और बढ़ने के लिए एक स्थिर और सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है।
• कच्चे माल की सस्ते दरों पर उपलब्धता: भारत में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है| इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कच्चे माल की सस्ती उपलब्धता और कच्ची सामग्रियों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करता है। इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समुचित और सुचारु संचालन में मदद मिलती है।

12. क्या भारत सरकार की नवरत्न नीति सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन को सुधारने में सहायक रही है? कैसे?

उत्तर

सार्वजनिक उपक्रमों की कुशलता बढ़ाने, उनके प्रबंधन में व्यवसायीकरण लाने और उनकी स्पर्धा क्षमता में प्रभावी सुधार लाने के लिए सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का चयन करके उन्हें ‘महारत्न, नवरत्न तथा लघुरत्न’ घोषित कर दिया| उन्हें कंपनी के कुशलतापूर्वक संचालन और लाभ में वृद्धि करने के लिए प्रबंधन और संचालन कार्यों में अधिक स्वायत्तता दी गई| वे अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बन गए तथा विश्व स्तरीय निकाय बन रहे हैं| इस प्रकार, नवरत्न नीति सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन को सुधारने में सहायक रही है|

13. सेवा क्षेत्रक के तीव्र विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारक कौन-से रहे हैं?

उत्तर

सेवा क्षेत्रक के तीव्र विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं:
• 1991 में शुरू किए आर्थिक सुधार नीति के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय वित्त के संचलन पर कई प्रतिबन्ध हटा दिए जिससे विदेशी पूँजी, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश तथा बाह्य प्रापण का भारत की अर्तव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा| इसने सेवा क्षेत्रक के तीव्र विकास को गति प्रदान की|
• कम मजदूरी दर पर सस्ते श्रम तथा कुशल श्रमिकों की उपलब्धता|
• भारत में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र में क्रांति ने सेवा क्षेत्र के तीव्र विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है|
• भारतीय अर्थव्यवस्था को संरचनात्मक परिवर्तन का सामना करना पड़ रहा है जिसका तात्पर्य है प्राथमिक से तृतीयक क्षेत्र में आर्थिक निर्भरता में परिवर्तन| इसके कारण, अन्य क्षेत्रों द्वारा सेवा क्षेत्र की माँग में वृद्धि हुई|

14. सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्रक दुष्प्रभावित हुआ लगता है? क्यों?

उत्तर

1991 के आर्थिक सुधारों में कृषि को लाभ नहीं पहुंचा है, जहां विकास दर में कमी आ रही है| इसके निम्नलिखित कारण हैं:
• सुधार अवधि में कृषि क्षेत्रक में सार्वजनिक व्यय विशेषकर आधारिक संरचना अर्थात सिंचाई, बिजली, सड़क निर्माण, बाजार संपर्कों और शोध प्रसार आदि पर व्यय में काफी कमी आई है|
• उर्वरक सहायिकी की समाप्ति ने भी उत्पादन लागतों को बढ़ा दिया है जिसका छोटे और सीमान्त किसानों पर बहुत ही गंभीर प्रभाव पड़ा है|
• इसके साथ ही, कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में कटौती, न्यूनतम समर्थन मूल्यों की समाप्ति और इन पदार्थों के आयात पर परिमाणात्मक प्रतिबन्ध हटाए जाने के कारण इस क्षेत्रक की नीतियों में कई परिवर्तन हुए|

15. सुधार काल में औद्योगिक क्षेत्रक के निराशाजनक निष्पादन के क्या कारण रहे हैं?

उत्तर

सुधार काल में औद्योगिक क्षेत्रक के निराशाजनक निष्पादन के निम्नलिखित कारण रहे हैं:
• विदेशी वस्तुओं के सस्ते आयात से घरेलू सामान के मांग को बदल दिया गया है|
• आधारभूत संरचनाओं की कमी के कारण, घरेलू उद्योग उत्पादन की लागत और वस्तुओं की गुणवत्ता के मामले में अपने विकसित विदेशी प्रतिस्पर्धियों से प्रतिसपर्धा नहीं कर सकते हैं|
• उच्च अप्रशुल्क बाधाओं के कारण भारत जैसे विकासशील देश विकसित देशों के वैश्विक बाजारों तक पहुँच नहीं हैं|
• उदारीकरण से पहले की अवधि के दौरान घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया गया था, लेकिन उदारवाद के समय घरेलू उद्योगों का विकास नहीं किया गया था और इसके परिणामस्वरूप वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके।

16. सामाजिक न्याय और जन-कल्याण के परिप्रेक्ष्य में भारत के आर्थिक सुधारों पर चर्चा करें|

उत्तर

यदि आर्थिक सुधारों ने हमें वैश्विक बाजारों और उच्च तकनीक तक पहुँचने का एक अवसर प्रदान किया है तो इसके साथ इसने गरीब वर्ग के लोगों के कल्याण से भी समझौता किया है| इसने स्थानीय उत्पादकों तथा किसानों को तबाह कर दिया है| परिणामस्वरूप, आय तथा धन की असमानताएँ पैदा होती है| इसके अतिरिक्त, आर्थिक सुधारों ने ऐसे क्षेत्रों का विकास किया जो दूर-दराज और अविकसित ग्रामीण क्षेत्र से महानगरीय शहरों के साथ अच्छी तरह से जुड़े थे| इसका परिणाम भारत की सेवा क्षेत्र के विकास, विशेषकर गुणवत्ता शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं, आईटी, पर्यटन, मल्टीप्लेक्स सिनेमा आदि के रूप में होता है| यह आबादी के गरीब वर्ग की पहुँच से बाहर होता है|

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