पाठ 1 - समकालीन विश्व में लोकतंत्र के नोट्स| Class 9th

पठन सामग्री और नोट्स (Notes)| पाठ 1 - समकालीन विश्व में लोकतंत्र (samkalin vishv me loktantra) Loktantrik Rajniti Class 9th 

इस अध्याय में विषय  

• लोकतंत्र के लिए संघर्ष
• लोकतंत्र के दो किस्से
→ 1973 का सैनिक तख्तापलट
→ लोकतंत्र की वापसी
→ पोलैंड में लोकतंत्र
→ लोकतंत्र की दो विशेषताएँ
• लोकतंत्र के तीन नक़्शे
• लोकतंत्र के विस्तार के विभिन्न चरण
→ शुरुआत
→ उपनिवेशवाद का अंत
→ हाल का दौर
• विश्व स्तर पर लोकतंत्र
→ अंतर्राष्ट्रीय संगठन
→ क्या ये निर्णय लोकतान्त्रिक हैं?
→ बाहरी समर्थन का सवाल

लोकतंत्र के लिए संघर्ष
• लोकतंत्र का फैलाव बहुत सरलता से और एक जैसे रूप में नहीं हुआ है| विभिन्न देशों में इसके काफी उतार-चढ़ाव हुए हैं। आज भी लोकतंत्र की स्थिरता और उसके टिकाऊपन को लेकर संदेह बना रहता है।

लोकतंत्र के दो किस्से

चिले में लोकतंत्र

• चिले, दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप का एक प्रमुख देश है।

• सल्वाडोर आयेंदे, चिले की सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक थे जिन्होंने 1970 के राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल की।

• राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने गरीबों और मजदूरों के फायदे वाले अनेक कार्यक्रम शुरू कराए जिनमें से कुछ निम्नलिखित थे:
→ शिक्षा प्रणाली में सुधार।
→ बच्चों को मुफ्त दूध बाँटना और भूमिहीन किसानों के बीच जमीन का पुनर्वितरण।
→ विदेशी कंपनियों द्वारा देश से तांबा जैसी प्राकृतिक सम्पदा को बाहर ले जाने का विरोध।

• लेकिन उनकी नीतियों को मुल्क में चर्च, जमींदार वर्ग और अमीर लोग तथा अन्य राजनीतिक पार्टियाँ पसंद नहीं करते थे।

• 11 सितम्बर 1973 को फ़ौज ने उनकी सरकार का तख्तापलट कर दिया।

1973 का सैनिक तख्तापलट

• 11 सितम्बर 1973 की सुबह, नौसेना के एक समूह ने बंदरगाह पर कब्ज़ा कर लिया और रक्षा मंत्री को तब गिरफ्तार कर लिया जब वे अपने कार्यालय पहुँचे।

• सेना के अधिकारियों ने राष्ट्रपति आयेंदे से पद छोड़ने को कहा लेकिन, उन्होंने इस्तीफा देने या देश से बाहर चले जाने से इनकार कर दिया।
→ उसके बाद फ़ौज ने राष्ट्रपति निवास को घेर लिया और उस पर बम बरसाने लगी। इस फौजी हमले में राष्ट्रपति आयेंदे की मौत हो गई।

• इस सैनिक तख्तापलट की अगुआई जनरल ऑगस्तो पिनोशे कर रहे थे।
→ अमेरिका की सरकार आयेंदे के शासन से खुश नहीं थी इसलिए उसने तख्तापलट करने वालों की गतिविधियों में मदद की, उनके लिए पैसे उपलब्ध कराए।

• इस तख्तापलट के बाद पिनोशे मुल्क के राष्ट्रपति बन बैठे और उन्होंने अगले 17 वर्षों तक राज किया।

• एक लोकतांत्रिक सरकार से चिले में सैन्य तानाशाही की स्थापना हुई।

• पिनोशे की सरकार ने आयेंदे के समर्थकों और लोकतंत्र की माँग करने वालों का दमन किया, उनकी हत्या कराई।

लोकतंत्र की वापसी

• पिनोशे का सैनिक शासन 1988 में तब समाप्त हुआ जब उन्होंने जनमत संग्रह कराने का फैसला किया| उन्हें भरोसा था कि लोग उनके शासन को जारी रखने के पक्ष में मतदान करेंगे।
→ लेकिन चिले के लोगों ने अपनी लोकतांत्रिक परम्परा को भुलाया नहीं था और उन्होंने भारी बहुमत से पिनोशे की सत्ता को ठुकरा दिया।
→ इस प्रकार चिले में राजनीतिक स्वतंत्रता बहाल हुई।

• धीरे-धीरे शासन में सेना की भूमिका ख़त्म होती गई।

• बाद में आई सरकारों ने पिनोशे के राज में हुई गड़बड़ियों की जाँच के आदेश दिए जिससे यह पता चला कि पिनोशे सरकार सिर्फ क्रूर ही नहीं थी बल्कि उसने भारी भ्रष्टाचार भी किया था।

• जनवरी 2006 में राष्ट्रपति आयेंदे की बेटी मिशेल बैशेले चिले की राष्ट्रपति बनी।
→ राष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने चिले के सबसे धनी व्यक्ति को हराया।

पोलैंड में लोकतंत्र

• 1980 में पोलैंड पर जारूजेल्सकी के नेतृत्व में पोलिश यूनाइटेड वर्कर्स पार्टी का शासन था।
→ इस देश में किसी अन्य राजनीतिक दल को राजनीति में भाग लेने की अनुमति नहीं थी।
→ लोग साम्यवादी शासन या दल के पदाधिकारियों का चुनाव अपनी इच्छा से नहीं कर सकते थे और नेताओं या पार्टी या सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेल में डाल दिया जाता था।

• पोलैंड की सरकार को एक बड़े साम्यवादी देश, सोवियत संघ का समर्थन हासिल था और वही इस पर नियंत्रण भी करता था।

लेनिन जहाज कारखाना के मजदूरों का हड़ताल

• 14 अगस्त 1980 को ग्डांस्क शहर स्थित ‘लेनिन जहाज कारखाना’ के मजदूरों ने हड़ताल की।
→ मजदूरों ने एक क्रेन चालक महिला को गलत ढंग से नौकरी से निकाले जाने के खिलाफ हड़ताल शुरू की।
→ कानून के अनुसार हड़ताल की इजाजत नहीं थी क्योंकि देश में शासक दल से अलग किसी स्वतंत्र मजदूर संघ की अनुमति नहीं थी।

• जहाज कारखाने का इलेक्ट्रशियन, लेक वालेशा जो 1976 में काम से निकाला गया था, हड़ताली कर्मचारियों के बड़ी माँगों में उनके संग हो लिया।
→ हड़ताल को समर्थन बढ़ता गया और जल्द ही यह पूरे शहर में फ़ैल गया। अब मजदूरों ने ज्यादा बड़ी माँगें करनी शुरू कर दीं।
→ उन्होंने स्वतंत्र मजदूर संघ बनाने की माँग की।
→ उन्होंने यह भी माँग की की राजनैतिक बंदियों को रिहा किया जाय और प्रेस पर लगी सेंसरशिप हटाई जाए।

• अंततः सरकार को हार माननी पड़ी और लेक वालेशा के नेतृत्व में मजदूरों ने सरकार के साथ 21 सूत्री करार किया और हड़ताल खत्म हुई।
→ इस प्रकार सरकार ने स्वतंत्र मजदूर संघ के गठन के लिए मजदूरों के अधिकार के मान्यता पर सहमति दी तथा हड़ताल का भी अधिकार दिया।

• ग्डांस्क संधि के बाद एक नया मजदूर संगठन ‘सोलिडरनोस्क’ बना।
→ किसी भी साम्यवादी देश में पहली बार एक स्वतंत्र मजदूर संघ का गठन हुआ।

• सरकार के कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार की व्यापकता के किस्से सामने आने सत्ता में बैठे लोगों की परेशानियाँ बढ़ती गईं।

• जनरल जारूजेल्सकी के नेतृत्व वाली सरकार एकदम बौखला गई और उसने दिसम्बर 1981 में मार्शल लॉ घोषित कर दिया।

• सोलिडेरिटी के हजारों सदस्यों को जेल में डाल दिया गया।
→ संगठन बनाने, विरोध करने और अभिव्यक्ति की आजादी फिर से छीन ली गई।

लोकतंत्र की वापसी

• 1988 में सोलिडेरिटी ने फिर से हड़तालें करवाई और लेक वालेशा ने इनकी अगुवाई की।

• इस समय पोलैंड की सरकार पहले से कमजोर थी, सोवियत संघ से मदद का भी पहले जैसा भरोसा न था और अर्थव्यवस्था में तेजी से गिरावट आ रही थी।

• अप्रैल 1989 में लेक वालेशा के साथ समझौता-वार्ता का एक और दौर चला तथा स्वतंत्र चुनाव कराने की माँग मान ली गई।

• सोलिडेरिटी ने सीनेट के सभी 100 सीटों के लिए चुनाव लड़ा और उसे 99 सीटों पर सफलता मिली।

• अक्टूबर 1990 में पोलैंड में राष्ट्रपति पद के लिए पहली बार चुनाव हुए जिसमें एक से ज्यादा दल हिस्सा ले सकते थे।
→ लेक वालेशा को पोलैंड का राष्ट्रपति चुना गया।

लोकतंत्र की दो विशेषताएँ

• लोकतंत्र सरकार का वह रूप है जिसमे लोग अपनी मर्जी से सरकार चुनते हैं।

• लोकतंत्र की दो विशेषताएँ हैं:
→ सिर्फ लोगों द्वारा चुने गए नेताओं को ही देश पर शासन करना चाहिए।
→ लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी, संगठन बनाने और विरोध करने की आजादी जरूरी है।

लोकतंत्र के तीन नक़्शे

• 1900 तक विश्व में कुछ ही लोकतांत्रिक शासन वाले देश थे जैसे, अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड आदि।

• 1950 तक दुनिया के अधिकांश उपनिवेशों को राजनैतिक आजादी मिल गई थी जैसे, भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार आदि।

• 1975 तक अधिकांश देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम हो चुकी थी। जबकि अधिकांश देशों में लोकतांत्रिक सरकार तानाशाहों द्वारा उखाड़ फेंका गया।

• 2000 आते-आते आधे से अधिक देश लोकतंत्र का अनुसरण करने लगे। सोवियत संघ के विघटन तथा अन्य लोकतांत्रिक देशों के समर्थन ने लोकतंत्र के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

लोकतंत्र के विस्तार के विभिन्न चरण

शुरुआत

• 1789 की फ्रांसीसी क्रांति ने फ्रांस में टिकाऊ और पक्के लोकतंत्र की स्थापना नहीं की थी।
→ लेकिन फ्रांसीसी क्रांति ने पूरे यूरोप में जगह-जगह पर लोकतंत्र के लिए संघर्षों की प्रेरणा दी।

• अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में हुए राजनैतिक घटनाक्रमों ने राजशाही और सामंत वर्ग की शक्ति में कमी कर दी थी।

• 1776 में उत्तर अमेरिका में स्थित ब्रिटिश उपनिवेशों ने खुद को आजाद घोषित कर दिया तथा एक साथ मिलकर संयुक्त राज्य अमेरिका अर्थात् आधुनिक अमेरिका का गठन किया।

• 1787 में उन्होंने एक लोकतांत्रिक संविधान को मंजूर किया लेकिन इस व्यवस्था में भी मतदान का अधिकार पुरूषों तक सीमित था।

• लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले लोग सभी वयस्कों- औरत या मर्द, अमीर या गरीब, श्वेत या अश्वेत को मतदान देने का अधिकार देने की माँग कर रहे थे। इसे ‘सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार’ या ‘सार्वभौम मताधिकार’ कहा जाता है।

• यूरोप, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के देशों में सबसे पहले आधुनिक लोकतंत्र की स्थापना हुई।

उपनिवेशवाद का अंत

• 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के तत्काल बाद अनेक देशों ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था अपना ली।

• जबकि अधिकांश देशों में लोकतंत्र अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी।

• पश्चिमी अफ्रीका का घाना देश ब्रिटिश उपनिवेश था तथा इसका नाम गोल्ड कोस्ट था।
→ 1957 में यह देश आजाद हुआ।
→ यह अफ्रीका के सबसे पहले आजादी पाने वाले देशों में एक था और इससे अनेक अफ्रीकी देशों को आजादी के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा मिली।
→ आजादी के बाद एनक्रूमा जिन्होंने घाना की आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई थी, घाना के पहले प्रधानमंत्री और फिर राष्ट्रपति बने।
→ उन्होंने अपने को आजीवन राष्ट्रपति के रूप में चुनवा लिया लेकिन थोड़े समय बाद ही 1966 में सेना ने उनका तख्तापलट कर दिया।

• घाना की तरह ही अधिकांश अफ्रीकी देशों का रिकार्ड कमो-बेश इसी तरह का रहा।

हाल का दौर

• लोकतंत्र की दिशा में ज्यादा तेजी से कदम उठाने का सिलसिला 1980 के बाद शुरू हुआ।
→ सोवियत संघ के बिखराव के साथ यह प्रक्रिया और तेज हुई।
→ सोवियत संघ में कुल 15 गणराज्य थे जो स्वतंत्र देशों के रूप में सामने आए और जिनमें से अधिकांश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था ही अपनाई।

• लातिन अमेरिका के अनेक देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली हुई।
→ 1990 के दशक में ही पाकिस्तान और बांग्लादेश में सैनिक शासन की जगह लोकतंत्र का आगमन हुआ।
→ लेकिन ये बदलाव स्थायी नहीं थे और 1999 में जनरल मुशर्रफ ने पाकिस्तान में फिर से सैनिक शासन कायम कर लिया।

• नेपाल में राजा ने अपने अनेक अधिकार, चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार को सौंपे और खुद संवैधानिक प्रमुख बने रहे।
→ 2005 में नेपाल के नए राजा ने चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया और पिछले दशक में लोगों को दी गई राजनैतिक आजादी को समाप्त कर दिया।

• 1948 में भारत का पड़ोसी देश म्यांमार, औपनिवेशिक शासन से आजाद हुआ और इसने लोकतंत्र को अपनाया।
→ लेकिन 1962 में सैनिक तख्तापलट से लोकतंत्र का अंत हो गया।
→ 1990 में आंग सान सू ची की अगुवाई वाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने चुनाव जीते।
→ परन्तु म्यांमार के फौजी शासकों ने सत्ता छोड़ने से इंकार कर दिया और चुनाव परिणामों को मान्यता नहीं दी| बल्कि उन्होंने सू ची समेत चुने हुए लोकतंत्र समर्थक नेताओं को गिरफ्तार कर जेल डाल दिया या उनके घर में ही नजरबन्द कर दिया।
→ यहाँ सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बोलने या बयान जारी करने वाले किसी भी व्यक्ति को बीस वर्ष तक की जेल की सजा हो सकती है।

→ म्यांमार की फौजी सरकार की ज्यादतियों से तंग आकर वहाँ के 6 से 7 लाख लोगों ने अपना घर-बार छोड़ दिया है और दूसरी जगहों पर शरणार्थी बनकर रह रहे हैं।

→ नजरबंदी की सजा झेलने के बावजूद सू ची ने लोकतंत्र के लिए अपना अभियान जारी रखा। उनके संघर्ष को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार भी मिला है।

→ फिर भी म्यांमार के लोगों का अपना देश में लोकतांत्रिक सरकार कायम करने संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है।

• सन् 2005 तक करीब 140 देशों में बहुदलीय प्रणाली के तहत चुनाव कराए जाते थे। यह संख्या पहले कभी भी इतनी अधिक नहीं रही।

अंतर्राष्ट्रीय संगठन

• दुनिया की ऐसी कोई सरकार नहीं है जिसके द्वारा बनाये गये कानून दुनिया भर के लोगों पर लागू होते हों।
→ पर दुनिया में ऐसी कई संस्थाएं हैं जो आंशिक रूप से ऐसी सरकार के कुछ काम करती है।
→ ये संगठन विभिन्न देशों और लोगों पर उस तरह का नियंत्रण नहीं रख सकते जैसा कि कोई सरकार रख सकती है, लेकिन वे ऐसे नियम बनाते हैं जो सरकारों के कामकाज की सीमा तय करते हैं- उनके लिए दिशा-निर्देश देते हैं।

• विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठन हैं :

→ संयुक्त राष्ट्र संघ- यह दुनिया भर के देशों का एक वैश्विक संगठन है जो अंतर्राष्ट्रीय कानून, सुरक्षा, आर्थिक निकाय और सामाजिक समता के मामले में परस्पर सहयोग स्थापित करने में मदद करता है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव इसके मुख्य प्रशासनिक अधिकारी हैं।

→ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्- यह संयुक्त राष्ट्र की ही एक संस्था है जिसकी विभिन्न देशों के बीच सुरक्षा और शांति बनाये रखने की जिम्मेवारी है। यह एक अंतर्राष्ट्रीय शांति दस्ता बनाकर गलती करने वालों के खिलाफ करवाई कर सकती है।

→ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष- जब सरकार को पैसों की जरूरत होती है तब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक सरकारों को ऋण देते हैं। उधार देने के पहले ये संस्थाएँ संबद्ध सरकार से अपना हिसाब-किताब दिखाने को कहती है और उनकी आर्थिक नीतियों में बदलाव के निर्देश देती है।

क्या ये निर्णय लोकतांत्रिक हैं?

• विश्व स्तर पर अनेक ऐसी संस्थाएँ हैं जो विश्व सरकार का काम करती हैं लेकिन ये लोकतांत्रिक निर्णय नहीं लेतीं।→ सभी सदस्य देशों को स्वतंत्रता और बराबरी की भागीदारी नहीं मिलती।

संयुक्त राष्ट्र का मामला

• संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों (1 सितम्बर 2012 की स्थिति) को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक-एक वोट मिला हुआ है।
→ महासभा का स्वरुप काफी कुछ संसद की तरह है जिसमें सभी तरह की चर्चाएँ होती हैं।
→ इसकी बैठक सदस्य देश के प्रतिनिधियों द्वारा चुने गए अध्यक्ष की अगुवाई में हर साल चलती है।
→ लेकिन विभिन्न देशों के बीच टकराव की स्थिति में महासभा कोई करवाई नहीं कर सकती है।
→ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के पंद्रह सदस्य महत्वपूर्ण फैसले लेते हैं। परिषद् के पाँच स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ़्रांस और चीन| बाकी दस सदस्यों का चुनाव आम सभा दो वर्ष के लिए ही करती है।
→ परन्तु असली ताकत पाँच स्थायी सदस्यों के हाथों में ही होता है।
→ इन स्थायी सदस्यों को वीटो अधिकार मिला है| अगर कोई भी स्थायी सदस्य देश इस अधिकार का प्रयोग करता है तो सुरक्षा परिषद् उसकी मर्जी के खिलाफ फैसला नहीं कर सकती।
→ इसी के चलते संयुक्त राष्ट्र को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की माँग करने वाले लोगों और देशों की संख्या बढ़ती जा रही है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा संगठन का मामला

• अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा संगठन दुनिया के किसी भी देश को उधार और ऋण देने वाली सबसे बड़ी संस्था है।
→ पर इसके सभी 188 सदस्य देशों को समान मताधिकार प्राप्त नहीं है।
→ हर देश इस कोष में जितने धन का योगदान करता है उसी अनुपात में उसके वोट का वजन भी तय होता है।
→ मुद्रा कोष के 52 प्रतिशत से अधिक वोटों पर सिर्फ दस देशों (अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन, चीन, इटली, सऊदी अरब, कनाडा और रूस) का अधिकार है।
→ बाकी 178 सदस्य इस अंतर्राष्ट्रीय संगठन के फैसलों को ज्यादा प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं।

विश्व बैंक का मामला


• विश्व बैंक में भी वोटिंग की ऐसी ही प्रणाली है।
→ विश्व बैंक का अध्यक्ष हमेशा कोई अमेरिकी नागरिक ही रहा है जिसका मनोनयन अमेरिकी वित्त मंत्री करते हैं।

बाहरी समर्थन का सवाल

• इराक पश्चिम एशिया का एक देश है जो 1932 में यह ब्रिटिश गुलामी से आजाद हुआ।
→ तीन दशक बाद यहाँ फ़ौज ने कई सरकारों का तख्ता पलटा।
→ बाथ पार्टी के नेता सद्दाम हुसैन ने 1968 के तख्तापलट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी तथा उसी से यह पार्टी सत्ता में आई थी।
→ इस सरकार ने पारम्परिक इस्लामी कानूनों को हटाया और औरतों को अनेक ऐसे अधिकार दिए जो अन्य पश्चिम एशियाई देशों में कहीं नहीं दिए गए थे।
→ 1979 में राष्ट्रपति बनने के बाद से सद्दाम हुसैन ने अपनी तानाशाही चलाई और अपने शासन का विरोध करने वालों का सख्ती से दमन किया।

• अमेरिका और ब्रिटेन आदि उसके सहयोगी देशों ने आरोप लगाया कि इराक के पास गुप्त परमाणु हथियार और ‘जनसंहार के हथियार’ हैं और इनसे दुनिया को बहुत खतरा है।
→ लेकिन जब संयुक्त राष्ट्र ने यह जाँचने के लिए अपनी विशेषज्ञ टीम इराक भेजी तो उस टीम को ऐसे कोई हथियार नहीं मिले।
→ फिर भी 2003 में अमेरिका और उसके साथी देशों ने इराक पर हमला किया, उस पर कब्ज़ा कर लिया और सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया।
→ अमेरिका ने अपनी पसंद की अंतरिम सरकार बना ली।
→ यह तर्क दिया जाता है कि देश में तानाशाही समाप्त करने के लिए तथा लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना के लिए यह महत्वपूर्ण था।

• इराक के खिलाफ युद्ध को सुरक्षा परिषद् ने भी मंजूरी नहीं दी थी। संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने भी कहा कि इराक के खिलाफ अमेरिकी युद्ध गैरकानूनी है।


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