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BSEB Solutions for शिक्षा और संस्कृति (Shiksha aur Sanskriti) Class 10 Hindi Godhuli Part 2 Bihar Board

शिक्षा और संस्कृति - महात्मा गाँधी प्रश्नोत्तर

Very Short Questions Answers (अतिलघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. किनका जन्म-दिन अहिंसा-दिवस के रूप में मनाया जाता है?
उत्तर

गाँधीजी का जन्म-दिन अहिंसा-दिवस के रूप में मनाया जाता है।


प्रश्न 2. गाँधीजी सबसे बढ़िया शिक्षा किसे बनते थे?
उत्तर
अहिंसक प्रतिरोध को गांधीजी सबसे बढ़िया शिक्षा मानते थे।


प्रश्न 3. गाँधीजी सारी शिक्षा कैसे देना चाहते थे?
उत्तर

गाँधीजी सारी शिक्षा किसी दस्तकारी या उद्योगों के द्वारा देना चाहते थे।


प्रश्न 4. गाँधीजी किस भाषा में संसार का ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे?
उत्तर

गाँधीजी अपनी ही देशी भाषा में संसार का ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे।


प्रश्न 5. भारतीय संस्कृति को गाँधीजी क्या समझाते थे ?
उत्तर

गाँधीजी की दृष्टि में भारतीय संस्कृति रत्नों से भरी है।


प्रश्न 6. कौन-सी संस्कृति जीवित नहीं रहती?
उत्तर
जो संस्कृति दूसरों का बहिष्कार करने की कोशिश करती है, वह जीवित नहीं रहती।


प्रश्न 7. अमरीकी संस्कृति की प्रवृत्ति क्या है ?
उत्तर

अमरीकी संस्कृति की प्रवृत्ति है बाकी संस्कृतियों को हजम करना, कृत्रिम और जबरदस्ती की एकता कायम करना।


Short Question Answers (लघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. गाँधीजी बढ़िया शिक्षा किसे कहते हैं ?
उत्तर
गाँधीजी ने बढ़िया शिक्षा अहिंसक प्रतिरोध की शिक्षा को कहते हैं।

प्रश्न 2. इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग सीखना क्यों जरूरी है ?
उत्तर
इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग सीखना इसलिए जरूरी है कि इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग उसकी बुद्धि के विकास का जल्द-से-जल्द और उत्तम तरीका है।

प्रश्न 3. शिक्षा का अभिप्राय गाँधीजी क्या मानते हैं ?
उत्तर
गाँधीजी शिक्षा का अभिप्राय मानते हैं कि बच्चे के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी गुणों को प्रकट किया जाय।

प्रश्न 4. मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास कैसे संभव है ?
उत्तर
जब बच्चों को कोई दस्तकारी सिखाई जाए और जिस क्षण से यह तालीम शुरू करें उसी क्षण उसे उत्पादन का काम करने योग्य बना दिया जाए। ये सारी शिक्षा दस्तकारी या उद्योग के द्वारा दी जाए तो उससे उनके मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास सम्भव है।

प्रश्न 5. गाँधीजी कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा सामाजिक क्रांति कैसे संभव मानते थे?
उत्तर
कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा प्राथमिक शिक्षा से नगर और ग्राम के संबंधों का एक स्वस्थ्यप्रद नैतिक आधार प्राप्त होगा और समाज की मौजूदा आरक्षित अवस्था और वर्गों के परस्पर विषाक्त सम्बन्धों में बड़ी बुराइयों को दूर करने में सहायता मिलेगी। साथ-साथ गाँव में बढ़ने वाला ह्रास भी रुकेगा। इस प्रकार की शिक्षा योजना से गाँधीजी सामाजिक क्रांति संभव मानते हैं।

प्रश्न 6. शिक्षा का ध्येय गाँधीजी क्या मानते थे और क्यों ?
उत्तर
शिक्षा का ध्येय गाँधीजी चरित्र-निर्माण मानते थे क्योंकि जब व्यक्ति चरित्र-निर्माण करने में सफल हो जायेगा तो समाज अपना काम आप सँभाल लेगा। इस प्रकार जिन व्यक्तियों का विकास हो जायेगा उनके हाथों में समाज के संगठन का काम सौंपना चाहते थे।

प्रश्न 7, गाँधीजी देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद कार्य क्यों आवश्यक मानते थे?
उत्तर
अन्य देशों की भाषा में जो ज्ञान भंडार पड़ा है। उसे देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद कार्य करके ही जाना जा सकता है। इसलिए देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद कार्य आवश्यक मानते थे।

प्रश्न 8. दूसरी संस्कृति से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ क्यों जरूरी है ?
उत्तर
दूसरी संस्कृति से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ जरूरी है क्योंकि अपनी संस्कृति को न समझकर अन्य संस्कृति को समझना या उसका अनुकरण करना आत्महत्या के समान है।

प्रश्न 9. गाँधीजी किस तरह के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं और क्यों ?
उत्तर
जो विभिन्न संस्कृतियाँ हिन्दुस्तान में पैर जमा चुकी है। जिनका भारतीय जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ चुका है और जो स्वयं भी भारतीय संस्कृति से प्रभावित हो चुके हैं वह सामंजस्य भारत के लिए बेहतर होगा क्योंकि इस प्रकार के सामंजस्य कुदरती तौर पर स्वदेशी ढंग का होगा । जिसमें प्रत्येक संस्कृति के लिए अपना उचित स्थान सुरक्षित होगा।

Long Question Answer (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)


प्रश्न 1. अपनी संस्कृति और मातृभाषा की बुनियाद पर दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं से सम्पर्क क्यों बनाया जाना चाहिए ? गाँधीजी की राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर 
अपनी संस्कृति और मातृभाषा की बुनियाद पर दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं से संपर्क बनाना चाहिए। इसमें गाँधीजी की राय है कि विभिन्न देशों की संस्कृति को हम जानें लेकिन उसके पहले अपनी संस्कृतियों को समझे क्योंकि अपनी संस्कृति की अवहेलना करके दूसरों की संस्कृति का आचरण आत्महत्या के बराबर है। उसी प्रकार दूसरों की भाषा से सम्पर्क करना भी निरर्थक होगा। उसके पहले हमें अपनी भाषा को हृदयांकित करना होगा। अगर हम अपनी मातृभाषा में विभिन्न - देशों की भाषाओं की अच्छी-अच्छी बातों का अनुवाद करते हैं तो हम भारतवासी अधिक-से-अधिक लाभान्वित हागे आर अधिक-से-अधिक देशों की भिन्न संस्कृतियों को भी जान पाएंगे।

प्रश्न 2. शिक्षा और संस्कृति पाठ का सारांश लिखें।
उत्तर
अहिंसक प्रतिरोध सबसे उदात्त और बढ़िया शिक्षा है जिसका ज्ञान बच्चों को अक्षर ज्ञान से पूर्व होनी चाहिए। बालकों में आत्मा, सत्य और प्रेम क्या है आत्मा में क्या-क्या शक्ति छुपी हैं इन सबा को जानना शिक्षा का अंग होना चाहिश इससे बच्चे अपने जीवन में घृणा को प्रेम में, असत्य को सत्य में और हिंसा को अहिंसा में बदलकर सच्चे मानव कहला सकते हैं। प्रेम, सत्य और अहिंसा काही थियार से मनुष्य सम्पूर्ण मानव जगत पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकता है। बच्चों के द्वारा शारीरिक इन्द्रियों का ठीक-ठीक उपयोग बद्धिबल से करना ही बुद्धि की सच्ची शिक्षा है। शारीरिक शिक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा से मस्तिष्क का सर्वांगीण विकास होता है।
शिक्षा से मेरा अभिप्राय यह है कि बच्चे और मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी गुणों को प्रकट किया जाय। शिक्षा का न अन्त है न आदि ही। इसलिए मैं बच्चे की शिक्षा का प्रारम्भ इस तरह करूँगा कि उसे कोई उपयोगी दस्तकारी सिखाई जाए और जिस क्षण से वह तालीम शुरू करें उसी क्षण उसे उत्पादन के काम करने योग्य बना दिया जाय। बच्चों में दस्तकारी यांत्रिक ढंग से नहीं बल्कि वैज्ञानिक ढंग से सिखानी पड़ेगी। ये जारी शिक्षा किसी दस्तकारी या उद्योग के द्वारा दी जाय जिससे उनके मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास संभव होगा।
बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा में सफाई, तन्दुरूस्ती, भोजन-शास्त्र, अपना काम आप करने और घर पर माता-पिता को मदद देने वगैरह के मूल सिद्धान्त शामिल हो। - कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योग द्वारा प्राथमिक शिक्षा देने की मेरी योजना में कल्पना यह है कि यह एक ऐसी शांत सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत बने, जिसमें अत्यंत दूरगामी परिणाम भरे हुए हों। इससे नगर और ग्राम के संबंधों का एक एक स्वास्थ्यप्रद नैतिक आधार प्राप्त होगा और समाज की मौजूदा आरक्षित अवस्था और वर्गों के परस्पर विषाक्त संबंधों में बड़ी बुराइयों को दूर करने में सहायता मिलेगी। इससे हमारे देहातों में बढ़ने वाला ह्रास रुक जायेगा तथा एक दिन ऐसी न्यायपूर्ण व्यवस्था की बुनियाद पड़ेगी, जिसमें गरीब-अमीर का अप्राकृतिक भेद न हो और हर एक के लिए गुजर के लायक कमाई और स्वतंत्रता के अधिकार का आश्वासन हो और यह सब किसी भयंकर और रक्तरंजित वर्ग युद्ध अथवा बहुत भारी पूँजी के व्यय के बिना भी हो जाएगा। मेरी योजना में विदेशों से मँगाई हुई मशीनरी या वैज्ञानिक और यांत्रिक दक्षता पर भी लाचार होकर निर्भर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बल्कि जनसाधारण के भाग्य का निपटारा स्वयं उन्हीं के हाथ में रहेगा।
स्वतंत्र भारत में शिक्षा का लक्ष्य होगा चरित्र-निर्माण। मैं साहस, बल, सदाचार और बड़े लक्ष्य के लिए काम करने में आत्मोत्सर्ग की शक्ति का विकास कराने की कोशिश करूँगा। जो साक्षरता से ज्यादा महत्वपूर्ण है, किताबी ज्ञान तो उस बड़े उद्देश्य का एक साधन मात्र है। मेरा ख्याल है कि अगर व्यक्ति चरित्र-निर्माण करने में सफल हो जाएँगे तो समाज अपना काम आप सँभाल लेगा। मैं चाहता हूँ कि अंग्रेजी या अन्य देशों की भाषाओं में जो ज्ञान-भंडार पड़ा है उसे राष्ट्र अपनी भाषा के द्वारा प्राप्त करें। इसके लिए हमें विद्यार्थियों का एक अलग वर्ग रखना होगा जो संसार की भिन्न-भिन्न भाषाओं में से सीखने की उत्तम बात जान ले और उनके अनुवाद देशी भाषाओं में करके देता रहे। कूप मंडूक बनना या अपने चारों ओर दीवारें खड़ी करना भेद विचार नहीं, मगर मेरा नम्रतापूर्वक यह कथन जरूर है कि दूसरी संस्कृतियों को समझना और कद्र करना स्वयं अपनी संस्कृति की कद्र होने और उसे हजम कर लेने के बाद होनी चाहिए, पहले हरगिज नहीं। मेरे मत से कोई भी संस्कृति इतने रत्न-भंडार से भरी नहीं, जितनी हमारी अपनी संस्कृति। हमने उसे जाना नहीं है। हमें तो उसके अध्ययन को तुच्छ मानना और उसका मूल्य कम करना सिखाया गया है। हमने अपनी संस्कृति के अनुकूल जीवन बिताना छोड दिया है। उसका ज्ञान हो मगर उस पर अमल न किया जाये तो वह मसाले में रखी लाख जैसी है, जो दिखने म सुन्दर भले हो लेकिन उससे कोई प्रेरणा या पवित्रता प्राप्त नहीं होती। हमारा धर्म यदि अपना सस्कृति को हृदयांकित करने और उसके अनकल चलने की प्रेरणा देता है तो दूसरा सस्कृतियों को तुच्छ समझने या उसकी उपेक्षा करना भी निषेध बताता हा क्यामी दूसरी संस्कृति को बहिष्कार कर कोई भी संस्कृति जिन्दा नहीं रह सकती।
भारत में शुद्ध आर्य संस्कृति जैसी कोई चीज नहीं है। आर्य लोग भारत के रहने वाले थे या जबरन यहाँ घुसे थे इससे मुझे बहुत दिलचस्पी नहीं है। लेकिन में इस बात से दिलचस्पी है कि मेरे पूर्वज एक-दूसरे के साथ बड़ी आजादी से मिल गये और मौजूदा पीढ़ी वाले हमलोग उस मिलावट की ही उपज है।
मैं चाहता हूँ कि सब देशों की संस्कृति की हवा हमारे चारों ओर स्वतंत्रतापूर्वक बहे। लेकिन यह नहीं चाहता कि उनमें से किसी के झोंके में हम उड़ जाएँ। मैं चाहूँगा कि साहित्य में रुचि रखने वाले हमारे युवा स्त्री-पुरुष जितना चाहे अंग्रेजी या संसार की अन्य भाषाएँ सीखें, फिर उनसे यह आशा रखूगा कि वे अपनी विद्वता का लाभ भारत और संसार को उसी तरह दें जैसे-बोस, राय और कविवर दे रहे हैं। लेकिन मैं यह नहीं चाहूँगा कि एक भी भारतवासी अपनी मातृभाषा को भूल जाएँ, उसकी उपेक्षा करें, उस पर शर्मिन्दा हों या असहाय अनुभव करें कि वह अपनी खुद की देशी भाषा में विचार नहीं कर सकता या अपने उत्तम विचार प्रकट नहीं कर सकता। मेरा धर्म कैदखाने का धर्म नहीं है।
भारतीय संस्कृति उन भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य का प्रतीक है जिनके हिन्दुस्तान में पैर जम गए हैं, जिनका भारतीय जीवन पर प्रभाव पड चका है और जो स्वयं भी भारतीय जीवन से प्रभावित हुए हैं। यह सामंजस्य कुदरती तौर पर स्वदेशी ढंग का होगा, जिसमें प्रत्येक संस्कृति के लिए अपना उचित स्थान सरक्षित होगा। वह अमरीकी ढंग का सामंजस्य नहीं होगा जिसमें एक प्रमुख संस्कृति बाकी संस्कृतियों को हजम कर लेती है और जिसका लक्ष्य मेल की तरफ नहीं बल्कि कृत्रिम और जबरदस्ती की एकता की ओर है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. अहिंसक प्रतिरोध सबसे उदात्त और बढ़िया शिक्षा है। वह बच्चों की मिलनेवाली साधारण अक्षर-ज्ञान की शिक्षा के बाद नहीं, पहले होनी चाहिए। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बच्चे को, वह वर्णमाला लिखे और सांसारिक ज्ञान प्राप्त करें उसके पहले यह जानना चाहिए कि आत्मा क्या है, सत्य क्या है, प्रेम क्या है और आत्मा में क्या-क्या शक्तियाँ छुपी हुई हैं। शिक्षा का जरूरी अंग यह होना चाहिए कि बालक जीवन-संग्राम में प्रेम से घृणा को, सत्य का बल अनुभव करने के कारण ही मैंने सत्याग्रह-संग्राम के उत्तरार्द्ध में पहले टॉल्सटाय फार्म में और बाद में फिनिक्स आश्रम में बच्चों को इसी ढंग की तालीम देने की भरसक कोशिश की थी।

प्रश्न.
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) सबसे उदात्त और बढ़िया शिक्षा क्या है ?
(ग) बच्चे को सांसारिक ज्ञान से पहले क्या जानना चाहिए?
(घ) शिक्षा का जरूरी अंग क्या होना चाहिए?
(ङ) हिंसा को कैसे जीता जा सकता है?

उत्तर

(क) पाठ का नाम-शिक्षा और संस्कृति।
लेखक का नाम महात्मा गाँधी।

(ख) अहिंसक प्रतिरोध सबसे उदात्त और बढ़िया शिक्षा है।

(ग) बच्चे को सांसारिक ज्ञान से पहले यह जानना चाहिए कि आत्मा क्या है, सत्य क्या है, प्रेम क्या है और आत्मा में क्या-क्या शक्तियाँ छुपी हुई हैं।

(घ) शिक्षा का जरूरी अंग यह होना चाहिए कि बालक जीवन-संग्राम में प्रेम से घृणा को, सत्य से असत्य को और कष्ट सहन से हिंसा को आसानी से जीतना सीखें।

(ङ) जीवन में कष्ट सहने की क्षमता विकसित करके हिंसा को आसानी से जीता जा सकता है।


2. मेरी राय में बुद्धि की शिक्षा शरीर की स्थूल इन्द्रियों, अर्थात् हाथ, पैर, आँख, कान, नाक वगैरह के ठीक-ठीक उपयोग और तालीम के द्वारा ही हो सकती है। दूसरे शब्दों में, बच्चे द्वारा इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग उसकी बुद्धि के विकास का जल्द-से-जल्द और उत्तम तरीका है। परन्तु, शरीर और मस्तिष्क के विकास के साथ आत्मा की जागृति भी उतनी ही नहीं होगी, तो केवल बुद्धि का विकास घटिया और एकांकी वस्तु ही साबित होगा। आध्यात्मिक शिक्षा से मेरा मतलब हृदय की शिक्षा है। इसलिए मस्तिष्क का ठीक-ठीक और सर्वांगीण विकास तभी हो सकता है, जब साथ-साथ बच्चे की शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों की भी शिक्षा होती रहे। ये सब बातें अविभाज्य हैं, इसलिए इस सिद्धांत के अनुसार यह मान लेना कुतर्क होगा कि उनका . विकास अलग-अलग या एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप में किया जा सकता है।

प्रश्न.
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखें।
(ख) बुद्धि की सच्ची शिक्षा कैसे हो सकती है?
(ग) बच्चे की बुद्धि के विकास का उत्तम तरीका क्या है?
(घ) आध्यात्मिक शिक्षा का अभिप्राय क्या है? ..
(ङ) मस्तिष्क का ठीक-ठीक विकास किस प्रकार किया जा सकता है?

उत्तर

(क) पाठ का नाम-शिक्षा और संस्कृति।
लेखक का नाम-महात्मा गाँधी।

(ख) बुद्धि की सच्ची शिक्षा शरीर की स्थूल इन्द्रियों, अर्थात् हाथ, पैर, आँख, कान, नाक वगैरह के ठीक-ठीक उपयोग और तालीम के द्वारा ही हो सकती है।

(ग) बच्चे द्वारा इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग उसकी बुद्धि के विकास का जल्द-से-जल्द और उत्तम तरीका है।

(घ) आध्यात्मिक शिक्षा से मतलब हृदय की शिक्षा है।

(ङ) मस्तिष्क का ठीक-ठीक विकास तभी हो सकता है जब साथ-साथ बच्चे की शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों की भी शिक्षा होती रहे।


3. शिक्षा से मेरा अभिप्राय यह है कि बच्चे और मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी उत्तम गुणों को प्रकट किया जाए। पढ़ना-लिखना शिक्षा का अन्त तो है ही नहीं; वह आदि भी नहीं है। वह पुरुष और स्त्री को शिक्षा देने के साधनों में केवल एक साधन है। साक्षरता स्वयं कोई शिक्षा नहीं है। इसलिए तो मैं बच्चे की शिक्षा का प्रारंभ इस तरह करूँगा कि उसे कोई उपयोगी दस्तकारी सिखाई जाए और जिस क्षण से वह अपनी तालीम शुरू करे उसी क्षण उसे उत्पादन का काम करने योग्य बना दिया जाए।

प्रश्न.
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) शिक्षा से गाँधीजी का क्या अभिप्राय है?
(ग) क्या साक्षरता को वास्तविक शिक्षा माना जा सकता है?
(घ) बच्चे की शिक्षा का प्रारंभ किस तरह से होनी चाहिए?
(ङ) बच्चे को उत्पादन का काम करने योग्य कब बना देना अच्छा होगा?

उत्तर

(क) पाठ का नाम–शिक्षा और संस्कृति।।
लेखक का नाम-महात्मा गाँधी।

(ख) शिक्षा से गाँधीजी का अभिप्राय यह है कि बच्चे और मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी उत्तम गुणों को प्रकट किया जाए।

(ग) साक्षरता को कोई शिक्षा नहीं माना जा सकता है।

(घ) बच्चे की शिक्षा का प्रारंभ इस तरह से हो कि उसे कोई उपयोगी दस्तकारी सिखाई जाए और जिंस क्षण से वह अपनी तालीम शुरू करें उसी क्षण उसे उत्पादन का काम करने योग्य बना दिया जाए।

(ङ) प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के समय ही बच्चे को उत्पादन का काम करने योग्य बना देना अच्छा होगा।


4. मैं चाहता हूँ कि उस भाषा (अंग्रेजी) में और इसी तरह संसार की अन्य भाषाओं में जो ज्ञान-भंडार भरा पड़ा है, उसे राष्ट्र अपनी ही देशी भाषाओं में प्राप्त करे। मुझे रवीन्द्रनाथ की अपूर्व रचनाओं की खूबियाँ जानने के लिए बंगला सीखने की जरूरत नहीं। वे मुझे अच्छे अनुवादों से मिल जाती हैं। गुजराती लड़कों और लड़कियों को टॉल्सटाय की छोटी-छोटी कहानियों से लाभ उठाने के लिए रूसी भाषा सीखने की आवश्यकता नहीं। वे तो उन्हें अच्छे अनुवादों के जरिए सीख लेते हैं। अंग्रेजों को गर्व है कि संसार में जो उत्तम साहित्य होता है, वह प्रकाशित होने के एक सप्ताह के भीतर सीधी-सादी अंग्रेजी में उस राष्ट्र के हाथों में आ जाता है।

प्रश्न.
(क) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(ख) गांधीजी क्या चाहते हैं ?
(ग) गाँधीजी को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं का आनन्द कैसे प्राप्त हो जाता है?
(घ) अंग्रेजों को किस बात का गर्व है?

उत्तर

(क) इस गद्यांश के लेखक हैं महात्मा गाँधी।।

(ख) गाँधीजी चाहते हैं कि संसार की विभिन्न भाषाओं में जो ज्ञान-भंडार है, वह देश के . लोगों को देशी भाषा में हासिल हो।

(ग) गाँधीजी को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं का आनन्द अनुवाद के द्वारा प्राप्त हो जाता है।

(घ) अंग्रेजों को इस बात का गर्व है कि संसार में जिस किसी भाषा में उत्तम साहित्य . का प्रकाशन होता है, वह एक सप्ताह के अन्दर सरल अंग्रेजी में उपलब्ध हो जाता है।


5. मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों ओर दीवारें खड़ी कर दी जाएँ और मेरी खिड़कियाँ बन्द कर दी जाएँ। मैं चाहता हूँ कि सब देशों की संस्कृतियों की हवा मेरे घर के चारों ओर अधिक-से-अधिक स्वतंत्रता से बहती रहे। मगर मैं उनमें से किसी के झोंके में उड़ नहीं जाऊँगा। मैं चाहूँगा कि साहित्य में रुचि रखनेवाले हमारे युवा स्त्री-पुरुष जितना चाहें अंग्रेजी और संसार की भाषाएँ और फिर उनसे आशा रखूगा कि वे अपनी विद्वता का लाभ भारत और संसार को उसी तरह दें जैसे बोस, राय या स्वयं कविवर दे रहे हैं लेकिन मैं यह नहीं चाहूँगा कि एक भी भारतवासी अपनी मातृभाषा भूल जाए उसकी उपेक्षा करे उस पर शर्मिंदा हो या यह अनुभव करे कि वह अपनी खुद की देशी भाषा में विचार नहीं कर सकता या अपने उत्तम विचार प्रकट नहीं कर सकता। मेरा धर्म कैदखाने का धर्म नहीं है।

प्रश्न.
(क) पाठ और लेखक का नाम लिखें।
(ख) लेखक का आसानी और अन्य देशों की संस्कृतियों के बारे में क्या विचार हैं?
(ग) संसार की अन्य भाषाओं के बारे में लेखक की क्या साय है?
(घ) मातृभाषा के संबंध में लेखक की धारणा क्या है ?
(ङ) लेखक का अपने धर्म को कैदखाना न मानने का क्या अभिप्राय है?

उत्तर

(क) पाठ-शिक्षा और संस्कृति। लेखक-महात्मा गाँधी।

(ख) लेखक चाहते हैं कि अन्य देशों की संस्कृतियों की जानकारी ली जाती रहे किन्तु उनके प्रवाह में बहा नहीं जाए। जो अच्छी बातें हैं उन्हें स्वीकार करने में हिचक न हो।

(ग) लेखक चाहते हैं कि हमारे युवा संसार की अन्य भाषाएँ सीखना चाहते हैं तो सीखें लेकिन अपनी जानकारी और विद्वता का लाभ देश को दें जैसे—जगदीशचन्द्र बोस और रवीन्द्रनाथ ठाकुर आदि दे रहे हैं।

(घ) लेखक चाहते हैं कि लोग अपनी मातृभाषा न भूलें, इसकी उपेक्षा न करें। ऐसा न हो कि अपने उत्तम विचार हमारे लोग अपनी मातृभाषा में प्रकट न कर सकें।

(ङ) लेखक अपने धर्म को कैदखाना नहीं मानते अर्थात् वे मानते हैं कि अपना हिन्दू धर्म नयी बातें सीखने में समर्थ है।


6. भारतीय संस्कृति उन भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य की प्रतीक है जिनके हिन्दुस्तान में पैर जम गए हैं, जिनका भारतीय जीवन पर प्रभाव पड़ चुका है और जो स्वयं भारतीय जीवन से प्रभावित हुई है। यह सामंजस्य कुदरती तौर पर स्वदेशी ढंग का है, जिसमें प्रत्येक संस्कृति के लिए अपना स्थान सुरक्षित है। यह अमरीकी ढंग का सामंजस्य नहीं है जिसमें एक प्रमुख संस्कृति बाकी संस्कृतियों को हजम कर लेती है और जिसका लक्ष्य मेल की तरफ नहीं बल्कि कृत्रिम जबरदस्ती की एकता की ओर है।

प्रश्न.
(क) पाठ और लेखक कारण बतार।
(ख) भारतीय संस्कृति कैसी है?
(म) भारतीय संस्कृति का सामंजस्व किस प्रकार का है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

(क) पाठ-शिक्षा और संस्कृति। लेखक-महात्मा गाँधी।

(ख) भारतीय संस्कृति उन अनेक संस्कृतियों के सामंजस्य का प्रतीक है, जिनके पैर.भारत में जम चुके हैं या वे स्वयं भारतीय जीवन से प्रभावित हैं।

(ग) भारतीय संस्कृति का सामंजस्य कुदरती है, स्वदेशी है। यह अमरीकी ढंग का नहीं है जिसमें एक संस्कृति बाकी संस्कृतियों को जबरदस्ती या कृत्रिम रूप से हजम कर लेती है। यह सामंजस्य आन्तरिक है। वस्तुतः भारतीय संस्कृति एक अनुपम संस्कृति है।

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