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BSEB Solutions for नाखून क्यों बढ़ते हैं? (Nakhun kyu Badhte hain) Class 10 Hindi Godhuli Part 2 Bihar Board

नाखून क्यों बढ़ते हैं? - हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रश्नोत्तर 

Very Short Questions Answers (अतिलघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1.जंगली मनुष्य को नाखून की जरूरत क्यों थी ?
उत्तर

उसकी (जंगली मनुष्य) जीवन-रक्षा के लिए नाखून बहुत जरूरी था।

प्रश्न 2. मनुष्य का नाखून बढ़ना किस वृत्ति का परिचायक है ?
उत्तर

नाखून बढ़ना मनुष्य की पाशविक वृत्ति का परिचायक है।


प्रश्न 3. हड्डी के हथियारों में सबसे मजबूत हथियार किसकी हड्डी से बना था?
उत्तर

हड्डी के हथियारों में सबसे मजबूत हथियार दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था।


प्रश्न 4. हिरोशिमा का हत्याकांड किसका जीवंत प्रतीक है ?
उत्तर
हिरोशिमा का हत्याकांड मनुष्य की भयंकर पाशविक वृत्ति का जीवंत प्रतीक है।


प्रश्न 5. भारतीय संस्कृति की क्या विशेषता है. ?
उत्तर

भारतीय संस्कृति की विशेषता है अपने-आप पर अपने-आप लगाया हुआ बंधना |


प्रश्न 6. भले और मूढ़ लोगों में क्या अन्तर है ? .
उत्तर

भले लोग अच्छे-बुरे की जाँच कर हितकर को ग्रहण करते हैं और मूढ़ लोग दूसरों के इशारों पर भटकते रहते हैं।


प्रश्न 7. महाभारत में सामान्य धर्म किसे कहा गया है?
उत्तर

महाभारत में निर्वैर भाव, सत्य और क्रोधहीनता को सामान्य धर्म कहा गया है।


प्रश्न 8. मनुष्य का स्वधर्म क्या है ?
उत्तर

अपने आप पर संयम और दूसरे के मनोभावों का समादर करना मनुष्य का स्वधर्म है।


Short Question Answers (लघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ?
उत्तर 
नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे लेखक की छोटी पुत्री ने उपस्थित किया।

प्रश्न 2. बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है ?
उत्तर
बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को याद दिलाता है कि मनुष्य कभी | लाख वर्ष पूर्व नख-दन्तावलंबी था। पशुत्व भाव को प्राप्त किये थी। नखों के द्वारा में ही प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़ता था। नख कट जाने पर उसको डाँट पड़ता होगा इत्यादि।

प्रश्न 3. लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप देखना कहाँ तक संगत है ?
उत्तर
नाखून ही मानव के अस्त्र थे। आज से लाख वर्ष पूर्व जब जंगल में रहता था। अपने पैने नुकीले नख से अन्य जीवों को आहट कर पेट भरता था। अपने नाखन के प्रहार से प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़ता था। इसलिए नाखूनों को अस्त्र के रूप । में देखना युक्तिसंगत है।

प्रश्न 4. मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है ?
उत्तर
नाखून मनुष्य का प्राचीनतम होथयार है। जिस समय मनुष्य पश की भाँति जीवन व्यतीत कर रहा था। आज मनुष्य उस पाशविक वृत्ति को छोड़ चका है। मानविक गुण आ जाने के कारण पशुता का त्याग करना ही उचित मानता है। इसलिए मनुष्य नाखून को अपना हथियार नहीं बनाना चाहता है। नाखून बढते हैं इसका बढ़ना मनुष्य के शरीर को सहज वृति है।
वह बार-बार बढ़ेगा। लेकिन मानव पशुता की ओर अधोगामिनी वृति नहीं अपनायेगा। उसे बार-बार काटता है और काटता रहेगा।

प्रश्न 5. नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं? इनका क्या अभिप्राय है?
उत्तर
मानव शरीर में कुछ सहजवृत्तियाँ होती रहती हैं। जैसे नाखून का बढ़ना, केश का बढ़ना आदि उसी प्रकार नाखून को बढ़ाना और उन्हें काटना भी मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं। इसका अभिप्राय यह है कि नाखून को बढ़ाना पशुत्व का प्रमाण और उसका काटना मानत्व का प्रमाण है। वह बढ़ता रहेगा लेकिन हम उसे काटकर पशुत्व का त्याग और मनुष्यता को ग्रहण करते रहें, क्योंकि पशु बनकर कोई आगे नहीं बढ़ सकता है।

प्रश्न 6. लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर ? स्पष्ट करें।
उत्तर
लेखक पूछता है। माना मेरी छोटी निर्बोध बालिका ने मनुष्य जाति से पूछ रही है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर। मनुष्य का अस्त्र-शस्त्र बढ़ना क्या पशुता की ओर नहीं ले जा रहा है। क्या मनुष्य अस्त्र काटने की ओर बढ़ रहा है? जवाब मिलेगा नहीं। फिर मनुष्य का मानत्व बढ़ना तो है ही नहीं। अर्थात् आज का मनुष्य अस्त्र-शस्त्र को बढ़ाकर पशु की ओर ही अधोगामिनी गति को प्राप्त कर रहा है।

प्रश्न 7. देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या हैं ?
उत्तर
देश की आजादी के लिए प्रयुक्त “इण्डिपेण्डेन्स" स्वाधीनता दिवस शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक का निष्कर्ष है कि 'इण्डिपेण्डेन्स' का अर्थ अन् अधीनता अर्थात् अधीनता का अभाव होता है लेकिन हम भारतीयों ने उसको सहज भाव में "स्वाधीनता" नाम दे दिया। यह हमारी विशेषता है कि हम 'अन्' को "स्व" में बदल डाला। जबकि स्वाधीनता के लिए अंग्रेजी शब्द "सेल्फ डिपेण्डेन्स" शब्द का प्रयोग होना चाहिए था।

प्रश्न 8. “स्वाधीनता' शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है ?
उत्तर
लेखक ने "स्वाधीनता" शब्द की सार्थकता बताते हुए कहते हैं कि “अनधीनता" (इण्डिपेण्डेन्स) को भारत के लोग "स्वाधीनता" के रूप में सोच लिया यह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। इसीलिए हम "स्व" के बंधन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

प्रश्न 9. मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएंगे।प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है?
उत्तर
प्राणिशास्त्रियों का अनुमान है कि मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे। इस अनुमान से लेखक के मन में आशा जगती है कि समय पाकर मानव के पूंछ झड़ गये। मानव में मानत्व के गुण आने लगे। पाशविक विकार दूर हुए। ठीक उसी प्रकार पशुता के प्रतीक यह बढ़ने वाला नाखून भी जब झड़ जाएँगे तब मानव में शेष पाशविक वृति भी समाप्त हो जायेगी और मनुष्य में मानविक वृति का संचार होने लगेगा।

प्रश्न 10. लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर 
लेखक हजारी प्रसार द्विवेदी जी की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है कि भारतीय चित्र जो आज "अधीनता" को रूप में न सोचकर । स्वाधीनता के रूप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। वह संस्कार "स्व" के बंधन को असानी से छोड़ नहीं सकता। अपने-आप पर अपने आप के द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है।

Long Question Answer (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)


प्रश्न 1. सुकुमार विनोदों के लिए नाखुन को उपयोग में लाना मनुष्य ने कैसे शुरू किया? लेखक ने इस संबंध में क्या बताया है ?
उत्तर
आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व विलासी प्रवृति के मनुष्यों ने नाखून को खूब सजा कर, संवार कर, उसे विविध आकार-प्रकार देकर काँट-छाँटकर सुन्दर और आकर्षक बनाते थे, जो उनके सुकुमार विनोद के काम में आता था। वात्सयायन काम-सूत्र के आधार पर लेखक ने उस कला को मनोरंजक बताया है। लेखक ने इस संबंध में यह भी कहा है कि उस समय लोग अपने नाखून को मोस से चिकतना करते थे, आलता से रंगते थे। गौड़ देश में लम्बे और दक्षिण के लोग छोटे नाखून रखते थे। नाखून बढ़ाने की प्रवृत्ति अधेगामिनी है। फिर भी हम भारतवासी उसे भी उचित माना।

प्रश्न 2. लेखक ने किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर
हम भारतीय "स्व" को अपनाये हुए हैं। उसे छोड़ना नहीं चाहते तभी तो "इण्डिपेण्डेन्स" (अनधीनता) को स्वाधीनता, स्वराज, स्वतंत्र, स्वतंत्रता आदि नाम रख लिया। यह हमारी परम्परा है। यदि यह बात है तो सब पुरानी भी अच्छी नहीं होती और सब नई भी खराब नहीं होता। हमें अपने पुराने के मोह को वांछनीय नहीं मानना चाहिए। क्योंकि मरे बच्चे को गोद में दबाए रहने वाली 'बंदिरया' मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती। लेखक का अभिप्राय है कि हमें पुराने और नये दोनों को परख कर जो हितकर लगे उसे अपना लेना ही मनुष्यता है।

प्रश्न 3. निबंध में लेखक ने किस बूढ़े का जिक्र किया है? लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है ?
उत्तर
निबंध में लेखक ने किसी बूढ़े नेता का जिक्र किया है। सम्भवतः महात्मा गाँधी का लक्ष्य करके जिक्र किया गया हो। जब एक ओर बड़े-बड़े नेता कह रहे थे, वस्तुओं की कमी है, मशीन बैठाओ, उत्पादन बढ़ाओ और धन की वृद्धि करो और बाह्य उपकरणों की ताकत बढ़ाओं तो दूसरी ओर वह वृद्ध नेता कह रहा था बाहर नहीं, भीतर की ओर देखा। हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओ, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो, आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो, आत्म-तोषण की बात सोचो। प्रेम ही बड़ी चीज है, क्योंकि वह हमारे भीतर है। उच्छंखलता पशु की प्रवृति है, "स्व" का बंधन मनुष्य का स्वभाव है। - वस्तुतः बूढ़े का कथन ही सार्थक है क्योंकि स्व बंधन से मुक्त होने का तात्पर्य है, मनुष्य को अपने स्वभाव से मुक्त होना। हमारी जो वर्तमान में धारणा है कि बाह्य उपकरणों के द्वारा सफलता प्राप्त की जाती है। यह धारणा गलत है। हमें अपने-आप (स्व) में परिवर्तन के लिए यदि प्रयत्नशील रहें तो हमारी सफलता स्वाभाविक होगी।

प्रश्न 4. "सफलता' और 'चरितार्थता' शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है ?
उत्तर
मनुष्य की सफलता और " चरितार्थता" शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता प्रतिपादित करते हुए कहा है कि "सफलता" मारक अस्त्र-शस्त्रों के संचयन से, बाह्य उपकरणों की बहुलता से सफलता प्राप्त किया जाता है जो आडंबर मात्र है। परन्तु मनुष्य की चरितार्थता-प्रेम में, मैत्री में, त्याग में तथा अपने को सबके मंगल के लिए नि:शेष भाव से दे देने में है।
नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की सहजवृति का परिणाम है जो जीवन में सफलता ले आना चाहती है, उसको काट देना उस "स्व" निर्धारित आत्मबंधन का फल है | जो मनुष्य को "चरितार्थता" की ओर ले जाती है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. कुछ लाख ही वर्षों की बात है जब मनुष्य जंगली था, वनमानुष जैसा उसे नाखून की जरूरत थी. उसकी जीवन-रक्षा के लिये नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्त्र थे। दाँत भी थे, पर नाखून के बाद ही उसका स्थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था। प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़ना पड़ता था। नाखून उसके लिए आवश्यक अंग था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओं का सहारा लेने लगा। पत्थर के ढेले और पेड़ की डालें काम में लाने लगा (रामचंद्र जी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अस्त्र थे।) उसने हड्डियों के भी हथियार बनाए। इन हड्डी के हथियारों में सबसे मजबूत और सबसे ऐतिहासिक का देवताओं के राजा का वज्र, जो दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था। मनुष्य और आगे बढ़ा। उसने धातु के हथियार बनाए।
जिनके पास लोहे के अस्त्र और शस्त्र थे, वे विजयी हुए। देवताओं के राजा तक को मनुष्यों के राजा से इसलिए सहायता लेनी पड़ती थी कि मनुष्यों के पास लोहे के अस्त्र थे। असुरों के पास । अनेक विद्याएँ थीं, पर लोहे के अस्त्र नहीं थे, शायद घोड़े भी नहीं थे। आर्यों के पास ये दोनों चीजें थीं। आर्य विजयी हुए। फिर इतिहास अपनी गति से बढ़ता गया। नाग हारे, सुपर्ण हारे, यक्ष हारे, गंधर्व हारे, असुर हारे, राक्षस हारे। लोहे के अस्त्रों ने बाजी मार ली। इतिहास आगे बढ़ा। पलीतेवाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों में इतिहास को किस कीचड़भरे घाट तक घसीटा है, यह सबको मालूम है। नखधर मनुष्य अब एटम बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसके नाखून अब भी बढ़ रहे हैं।
अब भी प्रकृति मनुष्य को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है, अब भी वह याद दिला देती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही लाख वर्ष के पहले के नख-दंतावलंबी जीव हो पशु के साथ एक ही सतह पर विचरण करने वाले और चरने वाले।

प्रश्न.
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) मनष्य को कब और क्यों नाखन की आवश्यकता थी
(ग) वज्र किसका हथियार था और वह कैसा था?
(घ) असुरों में अनेक विद्याएँ थीं फिर भी आर्यों से क्यों पराजित हुए ?
(ङ) अब भी प्रकृति मानव को क्या याद दिला देती है ?
(च) लेखक ने नख-दंतावलंबी जीव किसे कहा है ?

उत्तर

(क) पाठ का नाम- नाखून क्यों बढ़ते हैं।
लेखक का नाम- हजारी प्रसाद द्विवेदी।

(ख) जब मनुष्य वनमानुष जैसा जंगली था तब उसे नाखून की आवश्यकता थी क्योंकि मानव नाखून की सहायता से जंगली जीवों से रक्षा करता था; भोजन उपलब्धि में जीवों को मारने में सहायता लेता था।

(ग) वज्र इन्द्र का हथियार था और वह दधीचि की हड्डियों से बना था।

(घ) असुरों के पास अनेक विधाएँ थीं, पर लोहे के अस्त्र नहीं थे। शायद घोड़े भी नहीं थे। आर्यों के पास ये दोनों चीजें थीं इसी कारण आर्य विजयी हुए और असुर पराजित।।

(ङ) मानव को प्रकृति अब भी याद दिला देती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम्हारे अन्दर अब भी पशुता विद्यमान है।
(च) मनुष्य को।


2. मानव शरीर का अध्ययन करनेवाले प्राणिविज्ञानियों का निश्चित मत है कि मानव-चित्तं . – की भाँति मानव शरीर में बहुत-सी अभ्यास-जन्य सहज वृत्तियाँ रह गई हैं। दीर्घकाल तक उनकी आवश्यकता रही है। अतएव शरीर ने अपने भीतर एक ऐसा गुण पैदा कर लिया है कि वे वृत्तियाँ अनायास ही, और शरीर के अनजाने में भी, अपने-आप काम करती हैं। नाखून का बढ़ना उसमें से एक है, केश का बढ़ना दूसरा, दाँत का दुबारा उठना तीसरा है, पलकों का गिरना चौथा है। और असल में सहजात वृत्तियाँ अनजान स्मृतियों को ही कहते हैं।
हमारी भाषा में इसके उदाहरण मिलते हैं। अगर आदमी अपने शरीर की, मन की और वाक् की अनायास घटने वाली वृत्तियों के विषय में विचार करे, तो उसे अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले। पर कौन सोचता है ? सोचना तो क्या उसे इतना भी पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है।
उनहें काटने की जो प्रवृत्ति हैं, वह उसकी मनुष्यता की निशानी है और यद्यपि पशुत्व के चिह्न उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है। पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है।

प्रश्न.
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) प्राणि विज्ञानियों का वृत्तियों के बारे में क्या मत है ?
(ग) लेखक का नख बढ़ाने की प्रवृत्ति से क्या अभिप्राय है?
(घ) मानव शरीर में विद्यमान सहजात वृत्तियाँ क्या-क्या हैं ?
(ङ) नख काटने की प्रवृत्ति किसकी निशानी है?
(च) कौन-सी प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है ?
(छ) मनुष्य को अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में क्या मददगार होगा?

उत्तर

(क) पाठ का नाम- नाखून क्यों बढ़ते हैं।
लेखक का नाम- हजारी प्रसाद द्विवेदी।

(ख) प्राणी विज्ञानियों का निश्चित मत है कि मानव-चित्त की भाँति शरीर में भी बहुत-सी अभ्यासजन्य सहज वृत्तियाँ विद्यमान हैं। ,

(ग) लेखक नख बढ़ाने की प्रवृत्ति को मानव में अंतर्निहित पशुत्व का प्रमाण मानते हैं।

(घ) नाखून का बढ़ना, केश का बढ़ना, पलकों का गिरना, दाँत का दुबारा उठना इत्यादि मानव शरीर में विद्यमान सहजात वृत्तियाँ हैं।

(ङ) नख काटने की प्रवृत्ति मनुष्यता की निशानी है।

(च) अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है।

(छ) अगर मनुष्य अपने शरीर की; मन की और वाणी की अनायास घटनेवाली वृत्तियों के विषय में विचार करे, तो उसे अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले।


3. सोचना तो. क्या उसे इतना भी पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उन्हें काटने की जो प्रवृत्ति है, वह उसकी मनुष्यता । की निशानी है और यद्यपि पशुत्व के चिह्न उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है। पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। अस्त्र बढ़ाने – की प्रवृत्ति मनुष्यता की क्रोिधिनी है।

प्रश्न.
(क) प्राणीविज्ञानी के अनुसार मानव की सहजात वृत्ति क्या है?
(ख) मनुष्यता की विरोधिनी क्या है?
(ग) नाखून बढ़ना और नाखून काटना किसकी निशानी है ?
(घ) ‘पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता’-स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

(क) प्राणीविज्ञानी के अनुसार मानव की सहजात वृत्ति नाखून बढ़ाना है।

(ख) अस्त्र-शस्त्र जमा करना मनुष्यता की विरोधिनी है।

(ग) प्राणीविज्ञानी के अनुसार नाखून बढ़ाना मानव की सहजात वृत्ति है। यदि मनुष्य नाखून काटता है तो काटने की प्रवृत्ति मनुष्यता की निशानी है।

(घ) आदिकाल में मनुष्य को हिंसक होने की जरूरत थी इसलिए उसके बार-बार नाखून उग आए परन्तु आज मनुष्य सभ्य हो चुका है। वह हिंसा की भावना को नष्ट कर देना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि वह हिंसा या पशुता के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। उसे यह भी ज्ञान है कि अस्त्र-शस्त्र जमा करना मानवता का विरोध करना है।


4. हमारी परंपरा महिमामकी, उत्तराधिकार विपुल और संस्कार उज्ज्वल हैं। हमारे अनजाने में भी ये बातें एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देती हैं। यह जरूर है कि परिस्थितियों बदल गई हैं। उपकरण नए हो गए हैं और उलझनों की मात्रा भी बहुत बढ़ गई है, पर मूल समस्याएं बहुत अधिक नहीं बदली हैं। भारतीय चित्त जो आज भी अधीनता’ के रूप में न सोचकर ‘स्वाधीनता’ के रूप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। वह ‘स्व’ के बंधन को आसानी से छोड़ नहीं सकता। अपने-आप पर अपने-आप के द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है।

प्रश्न.
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) हमारी परम्परा कैसी है?
(ग) भारतीय चित्त में ‘स्व’ का भाव किसका प्रतिफल है?
(घ) गद्यांश का भावार्थ लिखें।

उत्तर

(क) पाठ- नाखून क्यों बढ़ते हैं।
लेखक- हजारी प्रसाद द्विवेदी।।

(ख) हमारी भारतीय परम्परा महिमामयी, उत्तराधिकार विपुल और संस्कार उज्ज्वल हैं। यह . हमारे अनजाने में ही एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देती है।

(ग) भारतीय चित्त में ‘स्व’ का भाव हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है।

(घ) हमारी महिमामयी परंपरा और उज्ज्वल संस्कार ही एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देते हैं। परिस्थितियों भले बदल गई हैं, पर समस्याएं बदली नहीं हैं। हमारे मानस में ‘स्व’ का जो भाव है, जो आत्म-बंधन की स्वीकृति है, वह दीर्घकालीन संस्कारों का फल है।


5. जातियाँ इस देश में अनेक आई हैं। लड़ती-झगड़ती भी रही हैं, फिर प्रेमपूर्वक बस भी गई हैं। सभ्यता की नाना सीढ़ियों पर खड़ी और नाना और मुख करके चलनेवाली इन जातियों के लिए सामान्य धर्म खोज निकालना कोई सहज बात नहीं थी।
भारतवर्ष के ऋषियों ने अनेक प्रकार से इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की थी। पर एक बात उन्होंने लक्ष्य की थी। समस्त वर्णों और समस्त जातियों का एक सामान्य आदर्श भी है। वह है अपने ही बंधनों से अपने को बाँधना। मनुष्य पशु से किस बात से भिन्न है। आहार-निद्रा आदि पशु-सुलभ स्वभाव उसके ठीक वैसे ही हैं, जैसे अन्य प्राणियों के। लेकिन वह फिर भी पशु से भिन्न हैं।
उसमें संयम है, दूसरे के सुख-दुख के प्रति संवेदना है, श्रद्धा है, तप है, त्याग है। वह मनुष्य के स्वयं के उद्भावित बंधन हैं। इसीलिए मनुष्य झगड़े-टंटे को अपना आदर्श नहीं मानता, गुस्से में आकर चढ़-दौड़ने-वाले अविवेकी को बुरा समझता है और वचन, मन और शरीर से किए गए असत्याचरण को गलत आचरण मानता है। यह किसी भी जाति या वर्ण या समुदाय का धर्म नहीं है। यह मनुष्यमात्र का धर्म है। महाभारत में इसीलिए निर्वैर भाव, सत्य और अक्रोध को सब वर्गों का सामान्य धर्म कहा है|

प्रश्न.
(क) मनुष्य को संयमित करनेवाला कौन-सा बंधन है ?
(ख) मनुष्य किन गुणों के कारण पशुओं से भिन्न माना जाता है ?
(ग)लेखक ने ‘स्वाधीनता’ को भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा गुण क्यों माना है ?
(घ) गलत आचरण किसे माना गया है ?

उत्तर

(क) मनुष्य को संयमित करनेवाला बंधन ‘स्व’ है। मनुष्य इस बंधन को स्वयं ही स्वीकार करता है। यही हमारी संस्कृति की विशेषता है।

(ख) लेखक के अनुसार आहार, निद्रा आदि पशुओं जैसी आदतें मनुष्य की भी है परन्तु
संयम, तप, त्याग, सुख-दुख के प्रति संवेदना आदि गुण उसे पशुओं से भिन्न बनाते हैं।

(ग) ‘स्वाधीनता’ का अर्थ है अपने ऊपर लगाया गया बंधन। अपने पर अपने द्वारा रोक लगाना भारतीय परंपरा है। मन में क्रोध आना पशुता की निशानी है परन्तु विवेक द्वारा संयमित करना मनुष्यता है।

(घ) वचन, मन और शरीर से किये गये असत्याचरण को गलत आचरण माना गया है।


6. मनुष्य को सुख कैसे मिलेगा? बड़े-बड़े नेता कहते हैं, वस्तुओं की कमी है, और मशीन बैठाओ, और उत्पादन बढ़ाओ, और धन की वृद्धि करो और बाह्य उपकरणों की ताकत बढ़ाओ। एक बूढा था। उसने कहा था–बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो। हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओ, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो, आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो; आत्म-तोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो।
उसने कहा-प्रेम ही बड़ी चीज है, क्योंकि वह हमारे भीतर है। उच्छृखलता पशु की प्रवृत्ति है, ‘स्व’ का बंधन मनुष्य का स्वभाव है। बूढ़े की बात अच्छी लगी या नहीं, पता नहीं। उसे गोली मार दी गई। आदमी के नाखून बढ़ने की प्रवृत्ति ही हावी हुई। मैं हैरान होकर सोचता हूँ बूढ़े ने कितनी गहराई में पैठकर मनुष्य की वास्तविक चरितार्थता का पता लगाया था।

प्रश्न.
(क) बड़े-बड़े नेताओं ने क्या कहा है ?
(ख) बूढ़ा कौन था? उसने क्या-क्या करने की सीख दी है ?
(ग) “एक बूढ़ा था”-लेखक ने किस बूढ़े की ओर संकेत किया है ?
(घ) लेखक हैरान होकर क्यों सोचता है ?

उत्तर

(क) बड़े-बड़े नेताओं ने मशीन बैठाने, उत्पादन बढ़ाने, धन की वृद्धि करने और बाह्य उपकरणों की ताकत बढ़ाने को कहा है।

(ख) बूढ़ा सत्य और अहिंसा का पुजारी था। यहाँ उसने बाहर नहीं, भीतर की ओर देखने, हिंसा को मन से दूर करने, मिथ्या को हटाने, क्रोध और द्वेष को दूर करने, लोक के लिए कष्ट सहने, प्रेम.की बात सोचने, उच्छृखलता को छोड़कर ‘स्व’ को अपनाने की सीख दी है।

(ग) ‘एक बूढ़ा था’-वाक्यांश में लेखक ने महात्मा गाँधी की ओर संकेत किया है।

(घ) बूढ़े द्वारा अच्छी बातें समझाने पर भी उसे गोली मारी गई। पशुता. या हिंसा को जितनी बार भी समाप्त करने का प्रयास किया जाता है, वह बढ़ती जाती है। वास्तविक चरितार्थता का पाठ पढ़ानेवाला भी गोली का ही शिकार हुआ। लोगों की ऐसी पशुवृत्ति को देखकर लेखक हैरान हो जाता है।


7. सफलता और चरितार्थता में अंतर है। मनुष्य मरणास्त्रों के संचयन से, बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडंबर के साथ सफलता नाम दे रखा है। परंतु मनुष्य की चरितार्थता प्रेम में है, मैत्री में है, त्याग में है, अपने को सबके मंगल के लिए नि:शेष भाव से दे देने में है। नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की उस अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले आना वाहती है, उसको काट देना उस ‘स्व-निर्धारित आत्म-बंधन का फल है, जो उसे चरितार्थता की ओर ले जाती है।

प्रश्न.
(क) मनुष्य की चरितार्थता किसमें है?
(ख) मनुष्य ने सफलता का नाम किसे दे रखा है ?
(ग) नाखूनों का बढ़ना और नाखूनों का कटना किस चीज का परिचायक है ?
(घ) सफलता और चरितार्थता में क्या अन्तर है?

उत्तर

(क) मनुष्य की चरितार्थता आपसी प्रेम, मित्रता और त्याग पर निर्भर करती है वास्तव में उसी का जीवन सफल है. जो दूसरे की भलाई के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दे।

(ख) मनुष्य मरणास्त्रों के संचयन से बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु में भी पा सकता है, जिसे उसने बड़े आडंबर के साथ अर्जित किया है। इसी रूप को मनुष्य ने सफलता का नाम दे रखा है।

(ग) नाखूनों का बढ़ना उस हिंसा का परिणाम है जिसके सहारे वह सफलता पाना चाहता है। दूसरी ओर नाखूनों को काटना आत्म-निर्धारित बंधन का फल है। मनुष्य को अपने बनाए गए बंधनों में ही बंधकर रहना चाहिए तभी मनुष्य-जीवन सफल है।

(घ) अपने बंधन में बंधकर जीवनयापन करना ही सफलता हैं जबकि चरितार्थता आपसी प्रेम, मित्रता और त्याग पर निर्भर करती है। परहित के लिए सर्वस्व अर्पित कर देना ही चरित्रार्थता है।

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