NCERT SOLUTIONS

BSEB Solutions for जित-जित में निरखत हूँ Class 10 Hindi Matric Godhuli

16:37 min read

BSEB Solutions for जित-जित में निरखत हूँ (Jit-Jit Me Nirkhat Hu) Class 10 Hindi Godhuli Part 2 Bihar Board

जित-जित में निरखत हूँ - पं० बिरजू महाराज प्रश्नोत्तर

Very Short Questions Answers (अतिलघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. लच्छु महाराज कैसे आदमी थे ?
उत्तर

लच्छु महाराज शौकीन आदमी थे और अप-टू-डेट रहते थे।


प्रश्न 2. बिरजू महाराज के पिता की मृत्यु कब और कैसे हुई?
उत्तर

बिरजू महाराज के पिता की मृत्यु 54 वर्ष की उम्र में लू लगने से हुई।


प्रश्न 3. बिरजू महाराज कौन-कौन से वाद्य बजाते थे?
उत्तर

बिरजू महाराज सितार, गिटार, बाँसुरी, हारमोनियम के अलावा तबला शौक के तौर पर बजाते थे।


प्रश्न 4. बिरजू महाराज का जन्म कहाँ और कब हआ था?
उत्तर

बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी 1938 ई में लखनऊ के जफरीन अस्पताल में हुआ था।


प्रश्न 5. बिरजू महाराज किस घराने के कलाकार थे?
उत्तर

बिरजू महाराज लखनऊ घराने के वंशज और उसकी सातवीं पीढ़ी के कलाकार थे।


प्रश्न 6. बिरजू महाराज नृत्य की किस शैली के महान नर्तक थे ?
उत्तर

बिरजू महाराज “कत्थक” नृत्य में पारंगत एक महान नर्तक थे।


प्रश्न 7. बिरजू महाराज को नृत्य का प्रशिक्षण सर्वप्रथम किससे प्राप्त हुआ?
उत्तर

बिरजू महाराज के प्रारम्भिक गुरु उनके पिताजी थे और उन्हें सर्वप्रथम प्रशिक्षण उनसे ही प्राप्त हुआ।


प्रश्न 8. बिरजू महाराज ने सर्वप्रथम नृत्य का प्रदर्शन कब प्रारम्भ किया ?
उत्तर

मात्र छः साल की उम्र में रामपुर के नवाब साहब की हवेली में उन्होंने नृत्य करना प्रारम्भ किया।


प्रश्न 9. निर्मला जी कौन थीं तथा बिरजू महाराज का उनसे किस प्रकार का संबंध था अथवा किस प्रकार जुड़े ?
उत्तर

निर्मला (जोशी) दिल्ली में हिन्दुस्तानी डान्स म्यूजिक नामक संस्था चलाती थीं, जहाँ बिरजू महाराज ने लगभग तीन वर्षों तक कार्य किया।


प्रश्न 10. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है ?
उत्तर

बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ में हुआ था। रामपुर में महाराज जी का अत्यधिक समय व्यतीत हुआ था एवं वहाँ विकास का सुअवसर मिला था।


प्रश्न 11. नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज किस संस्था से जुड़े और वहाँ किनके संपर्क में आए?
उत्तर

नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज जी दिल्ली में हिन्दुस्तानी डान्स म्यूजिक से जुड़े और वहां निर्मला जी जोशी के संपर्क में आए।


प्रश्न 12. किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला?
उत्तर
शम्भू महाराज चाचाजी एवं बाबूजी के साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला।


Short Question Answers (लघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है ?
उत्तर
लखनऊ बिरजू महाराज का पैतृक घर और जन्म स्थान है। रामपुर के नवाब के यहाँ इनके पिताजी नौकरी करते थे। रामपुर से ही इनका नाचना प्रारम्भ हुआ। वहाँ के नवाब इनके नृत्य से बहुत प्रसन्न रहते थे।

प्रश्न 2. नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज किस संस्था से जुड़े और वहाँ किन सम्पर्क में आए ?
उत्तर
नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज दिल्ली के "हिन्दुस्तानी डान्स म्यूजिक" संस्था से जुड़े और वहाँ के निर्मल जोशी' जी के सम्पर्क में आये।

प्रश्न 3. किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला ?
उत्तर
पिताजी और चाचा जी के साथ नाचते हुए में बिरजू महाराज को प्रथम पुरस्कार मिला था।

प्रश्न 4. बिरजू महाराज ने नृत्य की शिक्षा किसे और कब देनी शुरू की ?
उत्तर
1950 ई. में बिरजू महाराज 25-25 रुपये का दो ट्यूशन के माध्यम से नृत्य शिक्षा आर्य नगर में देते थे। वहीं सीमा राम बागला नामक एक लड़के को भी डांस सीखाते थे तथा उससे स्वयं हाई स्कूल की पढाई पढ़ते थे।

प्रश्न 5. बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुखद समय कब आया ? उससे संबंधित प्रसंग का वर्णन कीजिए।
उत्तर
बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुखद समय तब आया जब उनके पिताजी की मृत्यु हो गई। पैसा घर में एक भी नहीं। पिता के श्राद्ध हेतु दसवें के अन्दर बालक बिरजू को दो प्रोग्राम देना पड़ा जिससे 500 रुपये प्राप्त हुए थे। उस समय उनकी उम्र मात्र 91/2 वर्ष की थी। माता के साथ जहाँ-वहाँ घुम-घुमकर प्रोग्राम देकर अपना जीवन चला रहे थे।

प्रश्न 6. शंभु महाराज के साथ बिरजू महाराज के संबंध पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
शंभु महाराज बिरजू महाराज के चाचा थे। पिताजी के समय से ही खाना-पीना अलग होता है। वे खाने-पीने के शौकीन थे। पिताजी और चाचा जी साथ-साथ भी प्रोग्राम देते थे। पिता की मृत्यु के बाद शंभु महाराज के साथ बिरजू महाराज का सम्बन्ध पूर्ववत ही रहा।

प्रश्न 7. कलकते के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का विरजू महाराज के नर्तक जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा। बिरजू महाराज का नाम सभी अखबारों में छपे, अनेक प्रोग्राम आने लगे। बिरजू महाराज को भी आत्मविश्वास जगा तथा इसी प्रकार की प्रशंसा आगे भी मिलती रहे इसके लिए प्रयत्नशील रहने लगे।

प्रश्न 8. बिरजू महाराज कौन-कौन से वाद्य बजाते थे?
उत्तर
बिरजू महाराज कथक नृत्य के साथ-साथ सितार, गिटार, हारमोनियम, बाँसुरी सरोद और तवला आदि वाद्य यंत्र बजाते थे।

प्रश्न 9. अपने विवाह के बारे में बिरजू महाराज क्या बताते हैं ?
उत्तर
जब बिरजू महाराजा 18 साल के थे उस समय उनका विवाह हुआ था। बिरजू महाराज नहीं चाहते थे कि विवाह हो। परन्तु अम्मा जी की इच्छा से विवाह हुआ। विवाह करना वे अपनी बहुत बड़ी गलती मानते थे। पिताजी के मरने के बाद माता जी घबराहट में मेरी शादी करवा दी जो अच्छा नहीं हुआ।

प्रश्न 10. पुराने और आज के नर्तकों के बीच बिरजू महाराज क्या फर्क पाते हैं?
उत्तर
पुराने और आज के नर्तकों के बीच फर्क बताते हुए बिरजू हाराज ने बताया कि पुराने जमाने के नर्तक गलीचे, स्टेज आदि का कुछ विचार नहीं मन में लाते थे केवल प्रोग्राम देना है। चाहे गलीचे में जहाँ-तहाँ गड्ढे क्यों न हों, पंखा की तो कोई बात ही नहीं। हाँ कुछ नौकर-चाकर बड़े-बड़े पंखा लिए हांफते हुए चलाते थे। नाचने वक्त पंखा से हाथ नहीं टकरावे यह भी ख्याल करता था। आज के नर्तक लोग पहले स्टेज को ही कमजोर बताते हैं छोटा हैं, टेढ़ा है, गड्ढ़ा है। इत्यादि।

Long Question Answer (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)


प्रश्न 1. रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद क्यों चढ़ाया ?
उत्तर
रामपुर के नवाब बिरजू महाराज के नृत्य से बड़ा खुश रहते थे। मात्र छः वर्ष की उम्र में नवाब साहब इनकी नियुक्ति तनख्वाह पर कर ली। बिरजू जी की माता एवं पिता नहीं चाहते थे कि छ: वर्षीय बेटा नवाब की नौकरी करे। पिता ने नवाब साहब के सामने विरोध जाहिर किया तो बेटा नहीं तो बाप नहीं, कहकर दोनों बाप-बेटा को छुट्टी कर दी। जिस पर खुशी में हनुमान जी को लड्डु चढ़ाया गया था।

प्रश्न 2. बिरजू महाराज के गुरु कौन थे ? उनका संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर
बिरजू महारजा के गुरु उनके पिता ही थे। उनके पिता और चाचा दोनों कथक नृत्य के प्रवीण थे। बिरजू महाराज को शिष्यता स्वीकारते वक्त अपने बेटा बिरजू की कमाई 500/-लेकर उन्होंने बिरजू महाराज को गण्डा बाँधा (शिष्य स्वीकार किया) था। विशेषत: उनका समय रामपुर के नवाब के यहाँ व्यतीत हुआ। वहाँ की नौकरी छोड़ने के कुछ ही दिन बाद 54 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 3. संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या क्या थी?
उत्तर
संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या इस प्रकार थी। संगीत भारत में काम करना तथा ट्यूशन भी पढ़ाना। साईकिल से आना-जाना करते थे। दरियागंज के मकान में रहते थे। दरियागंज से प्रतिदिन पाँच या नौ नम्बर के बस से रीगल या ओडेन सिनेमा अथवा रिवोली तक जाते थे। जैन साहब के मकान में रहकर प्रतिदिन प्रातः चार बजे उठते थे। पाँच बजे से आठ बजे तक रियाज में करते थे। रियाज करते-करते थक जाने पर विविध वाद्य यंत्रों को बजाते थे।

प्रश्न 4. बिरजू महाराज की अपने शागिर्दी के बारे में क्या राय है ?
उत्तर
अपने शार्गिदों में पहला नाम "रश्मि वाजपेयी" का नाम है जो बहुत दिनों से बिरजू महाराज के साथ काम करती है। अच्छे खानदानी लड़की में "शाश्वती" जो 15-20 साल से इनके साथ रियाज में है। विदेशियों में "वैशेविक" तरक्की कर रही है| "फिलिप मेक्लीन टॉक" जो वापस स्वदेश चला गया है लेकिन पन: उसकी इच्छा है कि कुछ मुझसे सीखें "तीरथ प्रताप" और "प्रदीप" अच्छा नाम किया है।
"दर्गा" भी अच्छी तरक्की कर रही है। लेकिन गरीब परिवार की है परन्तु उसका मन नाचने में है। अन्य अनेक लड़कियाँ सीख रही हैं। लड़कों में नाच सीखने में कम मन लग रहा है। कृष्ण मोहन और राम मोहन और मेरे बेटे का ध्यान भी नहीं लगता है इत्यादि।

प्रश्न 5. निम्नांकित विषयों के बारे में जानकारी इकट्ठी करें :
(क) हिन्दुस्तानी डांस अकादमी
(ख) परन
(ग) सोलो
(घ) भारतीय कला केंद्र
(ङ) बैले
(च) मालती माधव
(छ) कमारसंभव
(ज) सत्यजीत रे
(झ) कपिला जी
उत्तर
  • (क) हिन्दुस्तानी डांस अकादमी - यह दिल्ली में नृत्य सिखाने का स्कूल था जहाँ बिरजू महाराज के पिताजी नाचना सिखलाते थे। बाद में वही संस्था 'संगीत भारती' नाम धारण कर लिया जहाँ 'बिरजू महाराज' 250 रुपये पर बहुत दिनों तक नौकरी की थी।
  • (ख) परन- परन एक वाद्य विद्या है जो तबले के बोल में होता है। जब नर्तक नाचता है यदि तबले पर परन बोल सुनाई पड़ता है तो नर्तक ताल भी देता है। अर्थात् तबले का वह बोल जिस पर नर्तक नाचलता और ताल देता है।
  • (ग) सोलो- यह नृत्य का एक प्रकार है जो एकल (अकेले) करता है वह सोलो कहलाता है। इसके विपरीत सामूहिक नृत्य कहलाता है।
  • (घ) भारतीय कला केन्द्र- भारतीय कला केन्द्र लखनऊ का एक नृत्यशाला है जहाँ विविध प्रकार के भारतीय नृत्य की शिक्षा दी जाती थी। जिस समय बिरजू महाराज भारतीय कला केन्द्र में क्लास लेना प्रारम्भ किये थे उस समय वहाँ लच्छु महाराज बड़े महाराज थे। मात्र 20 वर्ष उम्र के बिरजू महाराज के पास कोई लड़कियाँ नहीं सीखना चाहती थी जब प्रथम शिष्या रश्मि वाजपेयी बनी तो अन्य लड़कियाँ भी उनके तालिम से प्रभावित होकर बिरजू महाराज से ही सीखने लगी। अनेक प्रोग्राम भी भारतीय कला केन्द्र का देश-विदेश में हुआ। सब जगह बिरजू महाराज की सराहना हुई। यहीं से उनका दिन स्वर्णिम-सा हो गया।
  • (ङ) बैले - यह यूरोपीयन नृत्य है जो अत्यन्त प्रिय नृत्य है। इसमें गाया जाता है, सव भंगिमा भी प्रदर्शन किया जाता है तथा नाचना भी साथ होता है। अर्थात् नृत्य कथानक, भावाभिनय और नृत्य के साथ किया जाता है, बैले कहा जाता है।
  • (च) मालती माधव - मालती माधव नामक एक काव्य है नृत्य में मालती-माधव में वर्णित रंगार रस (प्रेमभाव) की बेले या भारतीय नृत्य शैली द्वारा प्रस्तुति होती है। जैसे कि गीत गोविन्द, कुमारसंभव आदि का।
  • (छ) कुमारसंभव - कुमारसंभव भी एक काव्य है जो महाकवि कालिदास की रचनाओं में प्रमुख हैं जिसमें शंकर पार्वती कार्तिकेय आदि के सम्वादों को भाव अभिनय नृत्य और कथानक में तैयार कर कुमारसंभव का महत्व बढ़ाया गया है। जैसे कि गीत गोविन्द मालती--माधव को नृत्य में रूपान्तरित किया गया है।
  • (ज) सत्यजीत रे- प्रसिद्ध फिल्म निर्माता रह चुके हैं। बिरजू महाराज बंबई में जाकर सबसे पहले। फिल्म का काम सत्यजीत रे की फिल्म का रिसेन्ट किया था।
  • (झ) कपिला जी - दिल्ली के हिन्दुस्तान डांस अकाडमी में नृत्य सिखलाती थी। जब बिरजू महाराज 6 वर्ष के थे, कपिला जी के सम्बन्ध में पिताजी के साथ जुड़े थे। वहाँ बिरजू जी के पिता नाच सिखाते थे। पिता की मृत्यु के बाद बिरजू महाराज का निवास लखनऊ बना वहीं चौदह वर्ष की उम्र में पुनः बिरजू महाराज को संगीत भारती (जो पहले हिन्दुस्तानी डांस अकाडेमी के नाम से प्रसिद्ध था) में लाने वाली कपिला जी ही थी।


प्रश्न 6. पाठ में आई तीनों कविताओं के भावार्थ लिखें।
उत्तर
कविता नं. -1
श्याम श्याम श्याम है।।
वृक्षन की ........................... शरण पाऊों
भावार्थ - सर्व जगह श्याम ही श्याम हैं। वृक्षों के पत्ते-पत्ते में, फूलों की कलियों में, पवन के झोंकों में, गुणियों के ताल में, गायक के स्वर में, कवियों के ह्रदय में | सर्वत्र श्याम ही श्याम हैं। हे व्रज में वास करने वाले श्याम आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि अंत तक आपका शरण मुझे प्राप्त रहे।

कविता नं. -2
आज प्रिय श्यामा श्याम भई।।
एक अजूबा ...................... राधा श्याम भई।
भावार्थ - हे सखी ! आज एक अजूबा देखकर मैं चकित रह गई। कृष्ण राधा को अपने अंक लगा लेते थे। उस समय राधा कृष्ण का एक जैसा रूप लगता था| मानो आज राधा ही कृष्ण बन गये हैं।
श्रीकृष्ण की बाँसुरी को अपने हाथ में लेकर बार-बार अपने अधर (और पर ले जाती थी और वंशी भी मधुर स्वर में बजने लगी। उस समय व्रज के श्याम सादृश्य सौन्दर्य को राधा प्राप्त कर गई थी।

कविता नं. -3
स्थिति नहीं, गति नहीं,
मुद्रा ..................... सृष्टि कथा कृति मूर्तिमान
भावार्थ - जब बिरजू महाराज का नृत्य आरम्भ होता था तो दर्शक न उनकी स्थिति, न गति, न मुद्रा और न ही भगिमा को देख पाते थे बल्कि उनके लय में ही सब लयमान हो जाते थे। मानो नृत्य का कथानक उनके सामने मूर्तिमान होकर उपस्थित हो गया हो।
जब बिरजू महाराजा के पैरों में घुघरू बजता तो ऐसा लगता मानो सम्पूर्ण अंतरिक्ष में घुमते चमकते तारे हों। घुघरू से निकलने वाला स्वर ऐसा लगता मानो देवलोक से निकलकर छोटे-छोटे स्वरों का जमीन पर सुन्दर समुद्र बन गया हो।
जब उनका पैर चलता था तो मानो कथानक बेबस होकर दर्शकों को अपने रंग में रंग दिया हो। उस समय का दृश्य इस प्रकार हो जाता था मानो स्वयं भगवान लीलापति लीला करने के लिए सज-धजकर उपस्थित हो गये हों अर्थात् दर्शक ईश्वरमय हो ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेते थे।
इनके नृत्य काल में ऐसा लगता था मानो अनन्त रूप में भाषा इनके पैर की दासी बन गई हो। उस समय वहाँ का वातावरण ऐसा हो जाता था मानो ध्वनियों के सौन्दर्य गृह में हृदयरूपी दीप स्थायी होकर प्रकाशित कर रहा हो।

कविता नं. 1 और कविता नं. 2 पं० बिरजू महाराज की रचना है। कविता नं. 3 पं० बिरजू महाराज के नृत्य का दर्शक श्रीराम वर्मा की रचना है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. बिरजू महाराज : जन्म मेरा लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938, 4 फरवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे; वसंत पंचमी के एक दिन पहले हुआ। घर में आखिरी सन्तान। तीन बहनों के बाद। सबसे छोटी बहन मुझसे आठ नौ साल बड़ी। अम्मा तब 28 के लगभग रही होंगी। बहनों का जन्म रामपुर में क्योंकि बाबूजी यहाँ 22 साल रहे। बड़ी बहन लगभग 15 साल बड़ी। उस समय बाबूजी रायगढ़ आदि राजांओं के यहाँ भी गए। मैं डेढ़ दो साल का था। उस समय विभिन्न राजा कुछ समय के लिए कलाकारों को माँग लिया करते थे। पटियाला भी गए थे पहले। रायगढ़ दो ढाई साल रहे होंगे। रामपुर लौटकर आए। रामपुर काफी अरसे रहे। जब पाँच छह साल के थे तो अकसर नवाब याद कर लिया करते थे। हलकारे आ गए तो जाना ही पड़ता था। चाहे जो भी वक्त हो।

प्रश्न.
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) बिरजू महाराज का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
(ग) महाराज अपने माता-पिता की कौन-सी संतान थे ?
(घ) महाराज की बहनों का जन्म कहाँ हुआ था?
(ङ) बडी बहन महाराज से कितने बडी थी?
(च) बाबूजी रामपुर में कितने दिन रहे थे?

उत्तर

(क) पाठ का नाम-जित-जित मैं निरखत हैं।
लेखक का नाम- पं बिरजू महाराज।

(ख) बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी, 1938 में जफरीन अस्पताल, लखनऊ में हुआ था।

(ग) महाराज अपने माता-पिता की आखिरी संतान थे।

(घ) महाराज की बहनों का जन्म रामपुर में हुआ था।

(ङ)बड़ी बहन महाराज से लगभग 15 साल बड़ी थी।

(च) बाबूजी रामपुर में 22 साल रहे थे।


2. छह साल की उम्र में मैं नवाब साहब को बहुत पसंद आ मया। मैं नाचता था जाकर। पीछे पैर मोड़कर बैठना पड़ता था। चूड़ीदार पैजामा साफा, अचकन पहन कर। अम्मा जी बेचारी बहुत परेशान। उन्होंने हमारे तनख्वाह भी बाँध दी थी। बाबूजी रोज हनुमानजी का प्रसाद माँगे कि 22 साल गुजर गए, अब नौकरी छूट जाए। नवाब साहब बहुत नाराज कि तुम्हारा लड़का नहीं होगा तो तुम भी नहीं रह सकते। खैर बाबू जी बहुत खुश हुए और उन्होंने मिठाई बांटी। हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया कि जान छूटी।

प्रश्न.
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) कितने साल की उम्र में महाराज नवाब को पसंद आ गये थे।
(ग) बचपन में नवाब के समक्ष क्या पहनकर महाराज नाचते थे।
(घ) बाबूजी हनुमान जी का प्रसाद क्यों मांगते थे?
(ङ) बाबूजी हनुमान जी को प्रसाद क्यों चड़ाये ?

उत्तर

(क) पाठ का नाम–जित-जित मैं निरखत हूँ। लेखक का नाम-बिरजू महाराज।

(ख) छह साल की उम्र में बिरजू नवाब को पसंद आ गये थे।

(ग) बचपन में महाराज चूड़ीदार पैजामा, साफा, अचकन पहनकर नवाब के समक्ष नाचते थे।

(घ) बाबूजीं चाहते थे कि नौकरी छूट जाए, इसलिए हनुमान जी का प्रसाद माँगते थे।

(ङ) नौकरी से जान छूटने की खुशी में हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया।


3. मेरी एक बड़ी खास आदत रही है, जैसे कि मेरे बाबूजी की भी थी कि जब शार्गिद को सिखा रहे हैं तो पूर्ण रूप से मेहनत कर सिखाना और अच्छा बना देना है। ऐसा बना देना कि मैं खुद हूँ। यह कोशिश है। पर अब भगवान की कृपा भी होनी चाहिए तब। मतलब कोशिश यही रहती है कि मैं कोई चीज चुराता नहीं हूं कि अपने बेटे के लिए ये रखना है उसको सिखाना है।

प्रश्न.
(क) पाठ और वक्ता का नामोल्लेख करें।
(ख) बिरजू महाराज का यह कथन किस संदर्भ में है ?
(ग) बिरजू महाराज अपनी किस आदत के बारे में क्या बताते हैं?

उत्तर

(क) पाठ-जित-जित मैं निरखत हूँ।
वक्ता–बिरजू महाराज।

(ख) बिरजू महाराज का यह कथन शिष्यों की शिक्षा के संदर्भ में है।

(ग) बिरजू महाराज अपने शिष्यों को शिक्षा देने के संदर्भ में अपनी आदत का उल्लेख करते – हुए कहते हैं कि अपने पिता की तरह उनकी खास आदत रही है शिष्यों को मेहनत करके सिखाना और उन्हें अच्छा अपने जैसा बनाने की चेष्टा करना है। वे कहते हैं कि वे बेटों और शिष्यों में ‘ भेद नहीं करते। वे जो अपने बेटों-बेटियों को सिखाते हैं, वह सब कुछ अपने शिष्यों को भी सिखाते हैं।


4. बि.म:-अम्माजी का बहुत बड़ा हाथ है। अम्माजी ने तो शुरू से उन बुजुर्गों की तारीफ कर करके मेरे सामने हरदम कि, बेटा वो ऐसे थे, उनको कम-से-कम इतना नाम तो याद था उन बुजुर्गों का। अभी आप दूसरे किसी से पूछे घर में तो उन्हें नाम भी नहीं मालूम था कि कौन थे। चाची (शंभू महाराज की पत्नी) से आप पूछे महाराज बिन्दादीन के बाद पहले और कौन थे तो उनको नहीं मालूम। तुमरियाँ भी मैंने उनसे सीखीं। मेरी वाकई में गुरुवाइन थी; वो माँ तो थीं ही। गुरुवाइन भी। और जब भी मैं नाचता था तो सबसे बड़ा एक्जामिनर या जज अम्मा को समझता था। जब भी वो नाच देखती थीं तो मैं कहता था उनसे कि मैं कहीं गलत तो नहीं कर रहा हूँ। मतलब बाबूजी वाला ढंग है ना कहीं गड़बड़ी तो नहीं हो रही। तो कही नहीं बेटा नहीं। उन्हीं की तस्वीर हो। पर बैले वैले यह तो मेरा भैया क्रियेशन है। वो हरदम ऐसे ही कहती रहीं और लखनऊ के जो बुजुर्ग थे उनसे भी, गवाही ली मैंने। चेंज तो नहीं लग रहा है। “नहीं बेटा वही ढंग है। और तुम्हारा शरीर वगैरह टोटल ढंग वैसा ही है। बैठने का, उठने का, बात करने का। मतलब जैसा था उनका।

प्रश्न.
(क) बिरजू को आगे बढ़ाने में किनका हाथ है?
(ख) बिरजू ने अपनी माँ को गुरुवाइन क्यों कहा है ?
(ग) नृत्य करते समय बिरजू अपना जज किसे मानते थे? और क्यों ?
(घ) बिरजू को गवाही लेने के लिए क्या करना पड़ता था ?

उत्तर

(क) बिरजू को आगे बढ़ाने में उनकी मां का हाथ है।

(ख) बिरजू की माँ अक्सर पूर्वजों का गुणगान कर उनमें हौसला भरा करती थीं। किसी का नाम पूछने पर झट से बता देती थीं। नृत्य में, गलत होने पर समझा देती थीं। अपनी माँ को गुरुवाइन कहा है।

(ग) जज का काम न्याय करना होता है। न्याय के मंच पर बैठा हुआ व्यक्ति अपना-पराया नहीं देखता है। बिरजूजी की मां नृत्य करते समय अच्छे-बुरे की ताकीद किया करती थीं। अच्छा होने पर ही वह अच्छा कहती थीं।

(घ.) नृत्य अच्छा हुआ या नहीं इसके लिए बिरजू महाराज अपनी माँ को नियुक्त करते थे। गायन और नृत्य में कहीं अन्तर तो नहीं हुआ इसके लिए माँ से पूर्वजों का उदाहरण लिया करते थे। इतना ही नहीं लखनऊवासियों से भी हामी भरवाते थे।


5. रामपुर नवाब के महल में भी नाचा हूँ नेपाल महाराज के यहाँ भी नाचा हूँ और जमींदारों के यहाँ भी नाचा हूँ जहाँ का मैं अक्सर तमाशा सुनाता रहता हूँ कि जहाँ महफिल भी लगी है कि लड़का नाचेगा जरा चारों तरफ थोड़ा खिसककर जगह बनाओ तो सब खिसक जायें तो नीचे गलीचा गलीचे पर चांदनी और चाँदनी गलीचे के नीचे जमीन पर कहीं पर गड्ढे हैं कहीं पर खाँचा है मतलब यह सब नहीं कौन परवाह करे। आजकल हमारे नये डांसर हैं कि स्टेज बड़ा खराब है बड़ा टेढ़ा है बड़ा गड्ढा है। हम लोगों को यह सब सोचने का कहाँ मौका मिलता था। अब गर्मी के दिनों में जरा सोचो न एयरकंडीशन; न कुछ वो बड़े-बड़े पंखे लेकर जो नौकर-चाकर थे, वो हाँकते रहते थे। उनसे भी हाथ बचाना पड़ता था। नाचने में उससे न लड़ जायें कहीं। दूसरे कि गैस लाइट जल रही है उसकी भी गर्मी।

प्रश्न.
(क) बिरजूजी का नृत्य कहाँ-कहाँ हुआ है ?
(ख) उस समय स्टेज की व्यवस्था कैसे होती थी?
(ग) पहले और आज के नर्तकों में क्या अन्तर है ?
(घ) सफल नर्तक की क्या पहचान है?

उत्तर

(क) बिरजूजी का नृत्य रामपुर नवाब के महल में, नेपाल महाराज के भवन में, अनेक जमींदारों आदि के यहाँ हुआ है।

(ख) उस समय स्टेज की व्यवस्था अजीबोगरीब होती थी। न समुचित रोशनी की व्यवस्था होती और न ही समतल फर्श आदि की होती थी। नृत्य हो इसके लिए साधारण रूप से व्यवस्था कर दी जाती थी।

(ग) पहले के नर्तक अपनी कला को प्रदर्शन करना जानते थे। उन्हें वाद्य-संयंत्रों, बिजली आदि की व्यवस्था से उतना संबंध नहीं रहता था। जो था उसी पर वे अपनी कला प्रदर्शित कर देते थे। आज के नर्तक कला, प्रदर्शन नहीं बाह्य आडंबर प्रदर्शित करते हैं। आज के लिए उन्हें चकाचौंध स्टेज, परिपूर्ण वाद्य-यंत्र चाहिए।

(घ) सफल नर्तक रंगमंच से प्रभावित नहीं होता है। बल्कि अपनी कला का आत्मसात करना * चाहता है। कला प्रदर्शन की क्षमता ही सफल नर्तक की पहचान है।

StudyRankers Author

About StudyRankers Team

Dedicated to providing the most accurate and high-quality educational resources for CBSE students. Our team consists of subject-matter experts committed to simplifying learning.