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BSEB Solutions for हमारी नींद (Hamari Neend) Class 10 Hindi Godhuli Part 2 Bihar Board

हमारी नींद - वीरेन डंगवाल प्रश्नोत्तर

Very Short Questions Answers (अतिलघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. वीरेन डंगवाल का जन्म कहाँ हुआ है ?
उत्तर

वीरेन डंगवाल का जन्म उत्तरांचल के कीर्तिनगर में हुआ।


प्रश्न 2. वीरेन डंगवाल ने काव्य रचना के अलावा क्या कर हिन्दी को समृद्ध किया है ?
उत्तर

वीरेन डंगवाल ने काव्य-रचना के अलावा विश्व के श्रेष्ठ कवियों की कविताओं का अनुवाद कर हिन्दी को समृद्ध किया है।


प्रश्न 3. यथार्थ को डंगवाल किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं?
उत्तर

यथार्थ को डंगवाल बिल्कुल नये अंदाज में प्रस्तुत करते हैं।


प्रश्न 4. वीरेन डंगवाल कैसे कवि हैं ?
उत्तर

वीरेन डंगवाल जनवादी परिवर्तन के पक्षधर प्रमुख सामयिक कवि हैं।


प्रश्न 5. ‘हमारी नींद’ कविता का संदेश क्या है ?
उत्तर

‘हमारी नींद’ कविता का संदेश है संघर्ष ही जीवन है।


प्रश्न 6. वीरेन डंगवाल की काव्य भाषा कैसी है ?
उत्तर
वीरेन डंगवाल की काव्य-भाषा में देशी ठाठ दिखाई देता है।


Short Question Answers (लघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. मक्खी के जीवन-क्रम का कवि द्वारा उल्लेख किए जाने का क्या आशय है?
उत्तर

मक्खी के जीवन क्रम का कवि द्वारा उल्लेख किए जाने का आशय है कि मानव जीवन क्रम में अनगिनत आशाएँ और इच्छाओं की उत्पत्ति होती है| उनमें से कुछ आशाएँ और इच्छा परिस्थिति के प्रतिकूलन के कारण समाप्त भी हो जाते हैं।

प्रश्न 2. कवि गरीब बस्तियों का क्यों उल्लेख करता है?
उत्तर

कवि गरीब बस्तियों का उल्लेख इसलिए करता है कि ग्रामीण परिवेश के लोग भी अब आराम और सुविधायुक्त जीवन जीना आरम्भ कर दिये हैं जिससे जीवन लापरवाही का शिकार हो जाता है।

प्रश्न 3. कविता में एक शब्द भी ऐसा नहीं है जिसका अर्थ जानने की कोशिश करनी पड़े। यह कविता की भाषा की शक्ति है या सीमा ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

किसी भी कविता में सरल शब्दों का प्रयोग करना भाषा की शक्ति नहीं बल्कि सीमा है। किसी भी कविता में या किसी भी भाषा की कविता में जटिल शब्दों की भी भाषा है लेकिन जब जटिलता की सीमा को पार कर सरल शब्द सीमा में रहकर हम कविता लिखते हैं तो सरल शब्दों का प्रयोग सीमा ही माना जाएगा।

Long Question Answer (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. कवि किन अत्याचारियों का और क्यों जिक्र करता है ?
उत्तर

कवि के द्वारा जिन अत्याचारियों का जिक्र किया गया है। वे हैं-आराम, सुविधा और लापरवाही। क्योंकि मानव जीवन में जब उपरोक्त आराम आदि अत्याचारियों का प्रभाव बढ़ जाते हैं तो मानव जीवन जो विकासशील है विकास की धारा कुछ अंशों में अवश्य शिथिल पड़ती है। अर्थात् अगर मानव जीवन में आराम, सुविधा और लापरवाही को जगह नहीं दी जाय तो अवश्य मानव जीवन के विकास की गति में अनुरूपता होगी।

प्रश्न 2. इन्कार करना न भूलने वाले कौन हैं ? कवि का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर
इन्कार करना न भूलने वाले हैं-आरामपसंद लोग, साधनसम्पन्न लोग और लापरवाह लोग। कवि का भाव यह है कि सभी लोग जानते हैं कि आराम, -सुविधा और लापरवाही को जीवन में स्थान देने से बहुत-सी इच्छाएँ, आकांक्षाओं आदि परिस्थिति के प्रतिकूलन के कारण से विनष्ट हो जाता है। लेकिन मनुष्य भी क्या चीज है जो विषम परिस्थिति को उत्पन्न करने वाले आराम, सुविधा और लापरवाही को इन्कारना भूलते ही नहीं।

प्रश्न 3. कविता के शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
उत्तर

“ हमारी नींद" अर्थात् हमारी लापरवाही या आराम पसंद जीवन आगे बढ़ने में बाधक है। अर्थात् ये सब चीजें गतिशील जीवन की गति को शिथिल करता हैं। परन्तु हमारा जीवन विषम परिस्थिति उत्पन्न करने वाली हमारी नींद की परवाह बिना किये भी आगे बढ़ता ही जाता है। कविता में "हमारी नींद" यदि जीवन का अवरोधक है तो जीवन भी "हमारी नोंद" से उत्पन्न बाधा का बिना परवाह किये आगे बढ़ता है। अत: इस कविता का शीर्षक "हमारी नींद" सार्थक है।

प्रश्न 4. कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि एक बिम्ब की रचना करता है। उसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि ने एक बिम्ब की रचना करते हुए कहा है कि मानव जीवन एक बीज के समान है। जैसे बीज में अंकुरण का ग होता है उसी प्रकार मानव जीवन में भी आगे बढ़ने का गुण प्रकृति प्रदत्त है। बोली का अंकुरण अनुकूलन बीज के परतों को चीड़कर निकल जाता है। उसी प्रकार मानव जीवन के आगे बढ़ते गुण परिस्थितियों के घेरे को तोड़कर आगे बढ़ जाता है।

प्रश्न 5. हमारी नींद कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर

जैसे नींद के दौरान कुछ इंच छोटे-छोटे पौधे बढ़ जाते हैं। उसी प्रकार मनुष्य के बेपरवाही में भी जीवन आगे बढ़ जाता है। जैसे अंकुर अपने नाममात्र कोमल सींग से बीज के भीतर फूली हुई छत को भीतर से धकेलना शुरू करता है। उसी प्रकार मानव जीवन परिस्थितियों से लडकर आगे बढ़ने का प्रयास करता है।
एक मक्खी के जीवन क्रम में अनेक शिशु पैदा होते हैं, उनमें से कुछ मर भी जाते हैं-दंगे, आगजनी और बमबारी में।
उसी प्रकार मानव जीवन क्रम में अनेक आकांक्षाएँ उत्पन्न होती हैं और उनमें से कुछ आकांक्षाएँ परिस्थितिवश स्वयं समाप्त हो जाते हैं तो कुछ परे भी होते हैं। मनुष्य की लापरवाही के बावजूद। जैसे गरीब बस्तियों में भी जोरदार तरीके से लाउडस्पीकर पर देवी जागरण होता है। अर्थात् ग्रामीण परिवेश में भी लोगों ने आराम, सुविधा और लापरवाहीयुक्त जीवन जीना आरम्भ कर दिया है। यानी साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने अर्थात् विभिन्न लापरवाही से जीवन घिर जाता है। मगर यह जीवन भी हठीला की भाँति आगे बढता जाता है बिना लापरवाही का परवाह किये बिना ही।
आरामतलब और लापरवाही जीवन मनष्य को आगे बढ़ने में परेशानी लाता है यह जानकर भी मनुष्य उसे जीवन बाधकों को इन्कार नहीं करना चाहते हैं।


काव्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. मेरी नींद के दौरान
कुछ इंच बढ़ गए पेड़
कुछ सूत पौधे
अंकर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से
धकेलना शुरू की
बीज की फूली हुई
छत, भीतर से।
एक मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ
कई शिशु पैदा हुए, और उनमें से
कई तो मारे भी गए
दंगे, आगजनी और बमबारी में।

प्रश्न.
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।

उत्तर

(क) कविता-हमारी नींद।
कवि-वीरेन डंगवाल।

(ख) प्रसंग हिन्दी साहित्य के समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल ने प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से सुविधाभोगी, आराम पसंद जीवन अथवा हमारी बेपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितियों से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जीवन का चित्रण किया है।

(ग) सरलार्थ प्रस्तुत पद्यांश में कवि एक बिम्ब की रचना करते हैं जो मानव जीवन और मानवेत्तर प्राणियों के आंतरिक और बाह्य जीवन चक्र, संघर्षशीलता के साथ चल रहे हैं। कवि स्वयं कविता के केन्द्र में बिम्ब के रूप में उपस्थित होकर कहता है कि जब मैं सुविधाभोगी बनकर आराम की नींद में सो रहा था तो इधर प्रकृति अन्य प्राणियों के जीवनक्रम को आगे बढ़ा रही थी। प्रकृति के आगोश में पलने वाले पेड़-पौधे के बीज भी धरातल के अन्दर प्रवेश कर अपने अंकुररूपी कोमल सींगों से बीज की छत को धकेल कर कुछ इंच पौधे के रूप में आगे बढ़ आये हैं। उसी प्रकार मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ तो इस जीवन क्रम में कई शिशु उत्पन्न हुए, उनमें से कई मारे गये। कई जगह दंगे-फसाद, आगजनी और बमबारी से मानव और मानवेत्तर प्राणियों का जीवनक्रम चलता रहा।

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत पद्यांश में कवि आराम तलबी, विलासिता में लिप्त जो मानव जीवन-यापन करते हैं और उनके ही इर्द-गिर्द घूमने वाले अन्य प्राणियों का जीवन-चक्र किस तरह से चलता है इसी का यहाँ दार्शनिक आकलन किया गया है। कवि मानवीय जीवन की लधुता और विधाता के समय की व्यापकता के माध्यम से कहता है कि मानव जीवन अति लघु है। इस लघु जीवन दुःख-सुख, जुल्म-अत्याचार, सहते हुए जीवन को विकास क्रम में ले जाना है। अतः विलासितापूर्ण जीवन को छोड़कर जीवन की यथार्थता को समझना चाहिए।

(ङ) काव्य-सौंदर्य-
(i) सम्पूर्ण कविता खड़ी बोली में रचित है।
(ii) छंद मुक्त होते हुए भी कहीं-कहीं कविता में संगीतमयता आ गयी है।
(iii) कवि की भाषा सरल और सुबोध है।
(iv) बिम्ब-प्रतिबिम्ब की झलक कविता की लाक्षणिकता पूर्णरूप से प्रकट होती है।
(v) भाव के अनुसार भाषा का वर्णन कविता की परिपक्वता दिखाई पड़ रही है।


2. गरीब बस्तियों में भी ।
धमाके से हुआ देवी जागरण
लाउडस्पीकर पर।
याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने
मगर जीवन हठीला फिर भी
बढ़ता ही जाता आगे
हमारी नींद के बावजूद
और लोग भी हैं, कई लोग हैं
अभी भी
जो भूले नहीं करना
साफ और मजबूत
इनकार।

प्रश्न.
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) दिये गये पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।

उत्तर

(क) कविता- हमारी नींद।
कवि- वीरेन डंगवाल।

(ख) प्रसंग-पस्तुत पद्यांश में कवि काल-क्रम की व्यापक एवं संघर्षशील गतिविधियों के दार्शनिक रूप का वर्णन करता है। जीवन-क्रम में जीव-जंतु से लेकर मानवीय जीवन जो प्रभावित होता है उनमें विपरीत परिस्थितियाँ जीवन को कुछ कहने-सुनने के लिए बाध्य करती है। यहाँ कवि यह बताना चाहता है कि सर्वदा सामंतशाहियों के चक्र में कमजोर और ईमानदार पिसता रहा है।

(ग) सरलार्थ-कवि मानव जीवन-क्रम का चित्रण करते हुए कहता है कि जहाँ झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीब लोग हैं जो केवल किसी तरह से अपने पेट की ज्वाला शांत करने की अपेक्षा कुछ नहीं जानते हैं। वहाँ भी विलासी लोग भगवती जागरण तथा अन्य ढोंगी कार्यक्रम के आड़ में लाउडस्पीकर बजवाकर ठगने का कार्य करते हैं। साथ ही समाज के कुछ लोग सुशिक्षित होकर भी मानवता की परिभाषा को झुठलाते हुए अत्याचारियों के द्वारा जुटाये गये साधनों को मूक होकर देखते रहते हैं। हम आराम तलबी जिंदगी में कर्महीनता का परिचय देकर मानवता को कलंकित करने में पीछे नहीं हट रहे हैं। इनमें आज भी ऐसे लोग हैं जो अपने सामने कमजोर, बेबस, मजबूर लोगों पर अत्याचारियों के द्वारा होते अत्याचार को देखकर केवल यह सोचकर चुप रह जाते हैं कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत कविता का भाव यह है कि आज के परिवेश में मनुष्य केवल स्वार्थपरता पर केन्द्रित है। साथ ही साथ कहा जा रहा है कि जमाना बाह्य जगत से काफी खतरनाक पैमाने पर टूट रहा है। लोग सच्चाई से मुख मोड़ रहे हैं।

(ङ) काव्य-सौंदर्य-
(i) सम्पूर्ण कविता खड़ी बोली में है।
(ii) तद्भव तत्सम के साथ-साथ कहीं-कहीं उर्दू शब्दों का भी समागम हुआ है।
(iii) पूरी कविता लक्षण शक्ति पर आधारित है।
(iv) भाव के अनुसार कविता में ओज गुण के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं।
(v) अलंकार और छंद के विशेष परिस्थितियों से दूर रहने पर भी कविता के उद्देश्य में अंतर नहीं आया है।

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