Notes of Class 9th: Ch 15 खाद्य संसाधनों में सुधार विज्ञान

Notes of Science in Hindi for Class 9th: Ch 15 खाद्य संसाधनों में सुधार विज्ञान 

विषय-सूची

  • फसल-उत्पादन में उन्नति
  • फसल की किस्मों में सुधार
  • फसल उत्पादन में सुधार
  • पोषक प्रबंधन
  • खाद
  • उर्वरक
  • सिंचाई
  • फसल पैटर्न
  • फसल सुरक्षा प्रबंधन
  • पशुपालन
  • पशु कृषि
  • कुक्कुट पालन (मुर्गी पालन)
  • मत्स्य उत्पादन
  • मधुमक्खी पालन

फसल उत्पादन में उन्नति

• फसलों के प्रकार जिनसे हम निम्नलिखित चीजें प्राप्त करते हैं

(i) अनाज- इनमें गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा आदि सम्मिलित हैं| ये हमें कार्बोहाइड्रेट प्रदान करते हैं|

(ii) बीज- पौधों में पाए जाने वाले सभी बीज खाने योग्य नहीं होते, जैसे- सेब का बीज, चेरी का बीज| खाने वाले बीजों में तिल, सरसों, सोयाबीन तथा मूँगफली हमें वसा प्रदान करते हैं|

(iii) दालें- इनमें चना, मटर, मसूर अरहर आदि हमें प्रोटीन प्रदान करते हैं|

(iv) सब्जियाँ, मसाले व फल- ये हमें विटामिन तथा खनिज लवण प्रदान करते हैं, जैसे- सेब, आम, चेरी, केला, तरबूज, सब्जियाँ, जैसे- पालक, पत्तीदार सब्जियाँ, मूली| मसाले, जैसे- मिर्च, काली मिर्च, इत्यादि का उपयोग किया जाता है|

(v) चारा फसलें, जैसे- वर्सीम, जई अथवा सूडान घास का उत्पादन पशुधन के चारे के रूप में किया जाता है|

फसलों के मौसम दो प्रकार के होते हैं, जिन्हें फसल-चक्र भी कहा जाता है

(i) खरीफ फसल: कुछ ऐसी फसलें जिन्हें हम वर्षा ऋतु में उगाते हैं, खरीफ फसल कहलाती है| यह जून से अक्टूबर तक के महीने में उगाई जाती है| धान, सोयाबीन, अरहर, मक्का, मूँग तथा उड़द खरीफ फसलें हैं|

(ii) रबी फसल: कुछ फसलें शीत ऋतु में उगाई जाती है, जो नवंबर से अप्रैल मॉस तक होती है| इन्हें रबी फसल कहते हैं| गेहूँ, चना, मटर, सरसों तथा अलसी रबी फसलें हैं|

फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया में प्रयुक्त गतिविधियों को निम्न प्रमुख वर्गों में बाँटा गया है

(i) फसल की किस्मों में सुधार

• फसल की किस्म में सुधार के कारक हैं अच्छे और स्वस्थ बीज|

संकरण- विभिन्न आनुवांशिक गुणों वाले पौधों के बीच संकरण करके उन्नत गुण वाले पौधे तैयार करने की प्रक्रिया को संकरण कहते हैं|

फसल की गुणवत्ता में वृद्धि करने वाले कारक हैं

उच्च उत्पादन- प्रति एकड़ फसल की उत्पादकता बढ़ाना|

उन्नत किस्में- उन्नत किस्में, फसल उत्पादन की गुणवत्ता, प्रत्येक फसल में भिन्न होती है| दाल में प्रोटीन की गुणवत्ता, तिलहन में तेल की गुणवत्ता और फल तथा सब्जियों का संरक्षण महत्वपूर्ण है|

जैविक तथा अजैविक प्रतिरोधकता- जैविक (रोग, कीट तथा निमेटोड) तथा अजैविक (सूखा, क्षारता, जलाक्रान्ति, गरमी, ठंड तथा पाला) परिस्थितियों के कारण फसल उत्पादन कम हो सकता है| इन परिस्थितियों को सहन कर सकने वाली फसल की हानि कम हो जाती है|

व्यापक अनुकूलता- व्यापक अनुकूलता वाली किस्मों का विकास करना विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में फसल उत्पादन को स्थायी करने में सहायक होगा| एक ही किस्म को विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न जलवायु में उगाया जा सकता है|

ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण- चारे वाली फसलों के लिए लम्बी तथा सघन शाखाएँ ऐच्छिक गुण है| इस प्रकार सस्य विज्ञान वाली किस्में अधिक उत्पादन प्राप्त करने में सहायक होती हैं|

(ii) फसल उत्पादन में सुधार

किसानों के द्वारा विभिन्न प्रकार की तकनीक इस्तेमाल की जाती है जिससे फसल के उत्पादन में वृद्धि होती है, वे निम्न हैं-

पोषक प्रबंधन- दूसरे जीवों की तरह पौधों को भी वृद्धि हेतु कुछ तत्वों (पोषक पदार्थों) की आवश्यकता होती है, जिन्हें पोषक तत्व कहते हैं| जैसे- कार्बन, पानी से हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन एवं शेष 13 पोषक पदार्थ मिट्टी से प्राप्त होते हैं|

वृहत पोषक- वायु तथा मृदा से नाइट्रोजन प्राप्त होता है जो कि अधिक मात्रा में पौधों को आवश्यकता होती है| अन्य वृहत पोषक तत्व हैं, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फ़र|

सूक्ष्म पोषक- लौह तत्व, मैगनीज कम मात्रा में आवश्यकता होती है| अन्य पोषक तत्व हैं- बोरोन, जिंक, कॉपर, क्लोरीन|

अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए मिट्टी में खाद तथा उर्वरक के रूप में इन पोषकों को मिलाना आवश्यक है|

खाद

खाद में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है तथा यह मिट्टी को अल्प मात्रा में पोषक प्रदान करते हैं| खाद को जंतुओं के अपशिष्ट तथा पौधों के कचरे के अपघटन से तैयार किया जाता है| खाद बनाने की प्रक्रिया में विभिन्न जैव पदार्थ के उपयोगों के आधार पर खाद को निम्न वर्गों में विभाजित किया जाता है :

(i) कंपोस्ट तथा वर्मी-कंपोस्ट

पौधों व उनके अवशेष पदार्थों, कूड़े-करकट, पशुओं के गोबर, मनुष्य के मल-मूत्र आदि कार्बनिक पदार्थों को जीवाणु तथा कवकों की क्रिया के द्वारा खाद रूप में बदलना कंपोस्टिंग कहलाता है|

• जब कंपोस्ट को केचुएँ के उपयोग से तैयार करते हैं जिसे वर्मी कंपोस्ट कहते हैं|

(ii) हरी खाद

• फसल उगाने से पहले खेतों में कुछ पौधे, जैसे पटसन, मूँग, अथवा ग्वार उगा देते हैं और तत्पश्चात उन पर हल चलाकर खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता है|

• ये पौधे हरी खाद में परिवर्तित हो जाते हैं जो मिट्टी को नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस से परिपूर्ण करने में सहायक होते हैं|

उर्वरक

उर्वरक व्यावसायिक रूप से तैयार पादप पोषक हैं| उर्वरक नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटैशियम प्रदान करते हैं| उर्वरक आसानी से पौधों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं तथा ये पानी में घुलनशील होते हैं|

खाद तथा उर्वरक में अंतर

खाद
उर्वरक
ये मुख्य रूप से कार्बनिक पदार्थ होते हैं| ये अकार्बनिक पदार्थ होते हैं|
ये प्राकृतिक पदार्थ के बने होते हैं| ये रासायनिक पदार्थों से मिलकर बनते हैं|
खाद में कम मात्रा में पोषक तत्व होते हैं| उर्वरक में अत्यधिक मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते हैं|
खाद सस्ती होती है तथा घर और खेत में बनाई जा सकती है| उर्वरक महँगे तथा फैक्ट्रियों में तैयार किए जाते हैं|
खाद धीरे-धीरे पौधे द्वारा अवशोषित की जाती है| क्योंकि ये पानी में अघुलनशील होते हैं| आसानी से फसल को उपलब्ध हो जाते हैं| पानी में घुलनशील होते हैं|
इसका आसानी से भंडारण तथा स्थानांतरण किया जा सकता है| इसका भंडारण तथा स्थानांतरण सरलता से नहीं किया जा सकता|

सिंचाई

फसलों को जल प्रदान करने की प्रक्रिया को सिंचाई कहते हैं|

सिंचाई के तरीके

(i) कुएँ

• ये दो प्रकार के होते हैं : खुदे हुए कुएँ तथा नलकूप|

• खुदे हुए कुएँ द्वारा भूमिगत जल स्तरों में स्थित पानी को एकत्रित किया जाता है|

• नलकूप में पानी गहरे जल स्तरों से निकला जाता है| इन कुओं से सिंचाई के लिए पानी को पंप द्वारा निकाला जाता है|

(ii) नहरें

• यह सिंचाई का एक बहुत विस्तृत तथा व्यापक तंत्र है| इसमें पानी एक या अधिक जलाशयों अथवा नदियों से आता है| मुख्य नहर से शाखाएँ निकलती हैं जो विभाजित होकर खेतों में सिंचाई करती हैं|

(iii) नदी जल उठाव प्रणाली

• इस प्रणाली में पानी सीधे नदियों से ही पम्प द्वारा इकट्ठा कर लिया जाता है| इस सिंचाई का उपयोग नदियों के पास वाली खेती में लाभदायक रहता है|

(iv) तालाब

आपत्ति के समय प्रयोग में आने वाले वे छोटे तालाब, छोटे जलाशय होते हैं, जो छोटे से क्षेत्र में पानी का संग्रह करते हैं|

(v) पानी का संरक्षण

• वर्षा के पानी को सीधे किसी टैंक में सुरक्षित इकट्ठा कर लिया जाता है| यह मृदा अपरदन को भी दूर करता है|

फसल पैटर्न

फसल की वृद्धि हेतु अलग-अलग प्रकार के तरीके अपनाए जाते हैं जिससे कि नुकसान कम से कम तथा उपज अधिक से अधिक हो|

मिश्रित खेती- दो या दो से अधिक फसल को एक साथ उगाना (एक ही भूमि) में मिश्रित खेती कहलाती है| जैसे- गेहूँ और चना, मूँगफली तथा सूरजमुखी|

अंतराफसलीकरण- अंतराफसलीकरण में दो या दो से अधिक फसलों को एक साथ एक ही खेत में निर्दिष्ट पैटर्न पर उगाते हैं| कुछ पंक्तियों में एक प्रकार की फसल तथा उनके एकांतर में स्थित दूसरी पंक्तियों में दूसरी प्रकार की फसल उगाते हैं|
जैसे- सोयाबीन + मक्का     बाजरा + लोबिया

फसल चक्र- किसी खेत में क्रमवार पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार विभिन्न फसलों को उगाने की प्रक्रिया फसल चक्र कहलाती है| यदि बार-बार एक ही खेत में एक ही प्रकार की खेती की जाती है तो एक ही प्रकार के पोषक तत्व मृदा से फसल द्वारा प्राप्त किए जाते हैं| बार-बार मृदा से पोषक तत्व फसल द्वारा प्राप्त करने पर एक प्रकार के पोषक तत्व समाप्त हो जाते हैं| अतः हमें अलग-अलग प्रकार की खेती करनी चाहिए|

फसल सुरक्षा प्रबंधन

• रोग कारक जीवों तथा फसल को हानि पहुँचाने वाले कारकों से फसल को बचाना ही फसल संरक्षण है| इस प्रकार की कठिनाइयों से बचने के लिए नीचे दिए गए तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं|

• फसल की वृद्धि के समय पीड़कनाशी का प्रयोग- वैसे जीव जो फसल को खराब कर देते हैं जिससे वह मानव उपयोग के लायक नहीं रहती, पीड़क कहलाते हैं|

पीड़क कई प्रकार के होते हैं

(i) खरपतवार: फसलों के साथ-साथ उगने वाले अवांछनीय पौधे खर-पतवार कहलाते हैं| उदाहरण- जेन्थियम, पारथेनियम|

(ii) कीट: कीट विभिन्न प्रकार से फसल तथा पौधों को नुकसान पहुँचाते हैं| वे जड़, तना तथा पत्तियों को काट देते हैं|

(iii) रोगाणु: कोई जीव जैसे- बैक्टीरिया, फंगस तथा वायरस जो पौधों में बीमारी पैदा करते हैं, रोगाणु कहलाते हैं|

अनाज का भंडारण के समय

• पूरे वर्ष मौसम के अनुकूल भोजन प्राप्त करने के लिए अनाज को सुरक्षित स्थान पर रखना अनिवार्य है, किंतु भंडारण के समय अनाज कितने ही कारणों से खराब और व्यर्थ हो जाता है|
जैसे- जैविक कारक- जीवित प्राणियों के द्वारा- कीट, चिड़िया, चिचड़ी, बैक्टीरिया, फंगस (कवक)|

अजैविक कारक

• निर्जीव कारकों द्वारा जैसे, नमी, तापमान में अनियमितता आदि| ये कारक फसल की गुणवत्ता तथा भार में कमी, रंग में परिवर्तन, तथा अंकुरण के निम्न क्षमता के कारण हैं|

पशुपालन

पशुधन के प्रबंधन को पशुपालन कहते हैं| ये पशुओं के भोजन, आवास, नस्ल सुधार तथा रोग नियंत्रण से संबंधित है|

पशुपालन के प्रकार

(i) पशु कृषि

पशु कृषि का मुख्य उद्देश्य

• दुग्ध प्राप्त करने के लिए|
• कृषि कार्य के लिए|

पशु कृषि के प्रकार:
• गाय
• भैंस

(ii) दूध देने वाली मादा

इनमें दूध देने वाले जानवर सम्मिलित होते हैं| जैसे- मादा पशु

हल चलाने वाले जानवर (नर)- वे जानवर जो दुग्ध नहीं देते तथा कृषि कार्य में सहायता करते हैं, जैसे- हल चलाना, सिंचाई, बोझा ढोना|

पशुओं की देखभाल

• सफाई- पशुओं की सुरक्षा के लिए हवादार तथा छायादार स्थान होना चाहिए| पशु के शरीर पर झड़े हुए बाल तथा धूल को हटाने के लिए नियमित रूप से उनकी सफाई करनी चाहिए| पानी इकट्ठा न हो इसके लिए ढलान वाले पशु आश्रय होने चाहिए|

• भोजन- भूसे में मुख्य रूप से फाइबर होना चाहिए| गाढ़ा प्रोटीन होना चाहिए तथा दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए खाने में विटामिन तथा खनिज होने चाहिए|

• बीमारी से बचाव- पशु अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित हो सकते हैं जिसके कारण उनकी दूध उत्पादन क्षमता में कमी अथवा उनकी मृत्यु भी हो सकती है| एक स्वस्थ पशु नियमित रूप से खाता है और ठीक ढंग से बैठता व उठता है|

पशु के बाह्य परजीवी तथा तथा अंतःपरजीवी दोनों हो सकते हैं| बाह्य परजीवी द्वारा त्वचा रोग हो सकते हैं| अंतःपरजीवी अमाशय, आँत तथा यकृत को प्रभावित करते हैं| इन विषाणु तथा जीवाणुजनित रोगों से बचाने के लिए पशुओं को टीका लगाया जाता है|

कुक्कुट (मुर्गी) पालन 

• अंडे तथा कुक्कुट माँस के उत्पादन को बढ़ाने के लिए मुर्गी पालन किया जाता है| दोनों हमारे भोजन में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाते हैं|

• अण्डों के लिए अंडे देने वाली (लेअर) मुर्गी पालन किया जाता है तथा मांस के लिए ब्रौलर को पाला जाता है|

निम्नलिखित गुणों के लिए नयी-नयी किस्में विकसित की जाती हैं

• नयी किस्में बनाने के लिए देशी जैसे लेगहार्न नस्लों का संकरण कराया जाता है|

(i) चूजों की संख्या तथा गुणवत्ता
(ii) छोटे कद के ब्रौलर माता-पिता द्वारा चूजों के व्यावसायिक उत्पादन हेतु|

मत्स्य उत्पादन (मछली उत्पादन)

• हमारे भोजन में प्रोटीन का मुख्य स्रोत मछली है|

मछली का उत्पादन दो प्रकार से होता है:

(i) प्राकृतिक स्रोत: विभिन्न प्रकार के जल स्रोतों से जीवित मछलियाँ पकड़ी जाती हैं|

(ii) मछली पालन या मछली संवर्धन- दूसरा स्रोत है- मछली पालन या मछली संवर्धन|

समुद्री मत्स्यकी

• समुद्री संवर्धन से मछली प्राप्त करना| यह समुद्र तथा लैगून में किया जाता है| कम खर्च करके अधिक मात्रा में इच्छित मछलियों का जल में संवर्धन किया जाता है, जिसे जल संवर्धन कहते हैं|

• भविष्य में समुद्री मछलियों का भंडार कम होने की अवस्था में मछलियों की आपूर्ति संवर्धन द्वारा हो सकती है| इस प्रणाली को समुद्री संवर्धन कहते हैं|

• कुछ आर्थिक महत्व वाली समुद्री मछलियों का समुद्री जल में संवर्धन भी किया जाता है| इनमें प्रमुख हैं- मुलेट, भेटकी तथा पर्लस्पॉट, कवचीय मछलियाँ जैसे-झींगा, मस्सल तथा ऑएस्टर|ऑएस्टर का संवर्धन मोतियों को प्राप्त करने के लिए लिया जाता है|

अंतःस्थली मत्स्यकी

मछली संवर्धन ताजे जल में होता है जैसे- तालाब, नदियाँ, नाले तथा जल भराव स्थल पर|

मिश्रित मछली संवर्धन

• एक ही तालाब में लगभग 5 से 6 प्रकार की मछलियों का संवर्धन किया जाता है| इस प्रक्रिया में देशी तथा आयातित प्रकार की मछलियों का प्रयोग किया जाता है| इनमें ऐसी मछलियों को चुना जाता है जिनमें आहार के लिए प्रतिस्पर्धा न हो अथवा उनके आहार भिन्न-भिन्न हों|
जैसे- कटला मछली जल की सतह से अपना भोजन लेती है| रोहु तालाब के मध्य क्षेत्र से अपना भोजन लेता है| इस प्रकार ये सभी मछलियाँ साथ-साथ रहते हुए भी बिना स्पर्धा के अपना आहार लेती हैं| इससे मछली के उत्पादन में वृद्धि होती है|

• मिश्रित मछली संवर्धन की समस्याएँ- समस्या यह है कि इनमें कई मछलियाँ केवल वर्षा ऋतु में ही जनन करती है| जिसके फलस्वरूप अधिकतर मछलियाँ तेजी से वृद्धि नहीं कर पातीं| इस समस्या से बचने के लिए हॉर्मोन का उपयोग किया जाता है ताकि किसी भी समय मछली जनन के लिए तैयार हो|

मधुमक्खी पालन

यह वह अभ्यास है जिसमें मधुमक्खियों की कॉलोनी को बड़े पैमाने पर रखा व संभाला जाता है और उनकी देखभाल करते हैं ताकि बड़ी मात्रा में शहद तथा मोम प्राप्त हो सके| अधिकतर किसान मधुमक्खी पालन आय स्रोत के लिए करते हैं|

ऐपिअरी

ऐपिअरी एक ऐसी व्यवस्था है जिससे अधिक मात्रा में मधुमक्खी के छत्ते मनचाही जगह पर अनुशासित तरीके से इस प्रकार रखे जाते हैं कि इससे अधिक मात्रा में मकरंद तथा पराग एकत्र हो सकें|

• व्यावसायिक स्तर पर मधु उत्पादन के लिए देशी किस्म की मक्खी ऐपिस सेरेना इंडिका, ऐपिस डोरसेटा तथा ऐपिस फ्लोरी का प्रयोग करते हैं| एक इटली-मधुमक्खी (ऐपिस मेलीफेरा) का प्रयोग मधु के उत्पादन को बढ़ाने के लिए किया जाता है|

• चारागाह- मधुमक्खियाँ जिन स्थानों पर मधु एकत्रित करती हैं, उसे मधुमक्खी का चारागाह कहते हैं| मधुमक्खी पुष्पों से मकरंद तथा पराग एकत्र करती है| चारागाह के पुष्पों की किस्में शहद के स्वाद तथा गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं|

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