NCERT Solutions for Class 11th: पाठ 6 - ग्रामीण विकास

NCERT Solutions for Class 11th: पाठ 6 - ग्रामीण विकास (Gramin Vikas) Bhartiya Arthvyavastha Ka Vikash

अभ्यास

पृष्ठ संख्या 118

1. ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्नों को स्पष्ट करें|

उत्तर

‘ग्रामीण विकास’ एक व्यापक शब्द है| यह मूलतः ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन घटकों के विकास पर ध्यान केन्द्रित करने पर बल देता है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास में पिछड़ गए हैं|

ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्न निम्नलिखित हैं:

• मानव पूँजी निर्माण: शिक्षा में निवेश किया जाना चाहिए| स्वास्थ्य और तकनीकी कौशल लोगों को अधिक कुशल और काम करने में सक्षम बनाने के लिए आवश्यक है|

• उत्पादक संसाधनों का विकास: ग्रामीण लोग मुख्य रूप से अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर होते हैं जो आम तौर पर कम उत्पादकता, आधारिक संरचनाओं की कमी और छुपी हुई बेरोजगारी से ग्रस्त हैं| इसलिए, उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से वैकल्पिक व्यवसाय के विकास का प्रयास करना चाहिए|

• भूमि-सुधार: तकनीकी सुधारों के साथ भूमि सुधारों से किसान आधुनिक तकनीकों और विधियों का उपयोग कर सकते हैं जो कि उत्पादकता और कृषि उत्पादन की कुल मात्रा में वृद्धि करते हैं| भूमि सुधारों से जमीन का कुशल और अनुकूलतम उपयोग हो सकता है, जो बड़े पैमाने पर उत्पादन को सक्षम करता है|

• आधारिक संरचनाओं का विकास: आधारिक संरचना, जैसे- बिजली, सिंचाई, बैंक, ऋण, परिवहन, बाजारों के विकास आदि सभी प्रकार के विकास के प्राथमिक स्तर हैं|

• निर्धनता निवारण: निर्धनता निवारण और समाज के कमजोर वर्गों की जीवन दशाओं में महत्वपूर्ण सुधार के विशेष उपाय, जिसमें उत्पादक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए|

2. ग्रामीण विकास में साख के महत्व पर चर्चा करें|

उत्तर

ग्रामीण विकास में साख का बहुत महत्व है| कृषि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि समय-समय पर कृषि और गैर-कृषि कार्यों में उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए मुख्य रूप से पूँजी के प्रयोग पर निर्भर करती है| खेतों में बीजारोपण से फसल पकने के बाद आमदनी होने तक की अवधि बहुत लंबी होती है| इसी कारण किसानों को बीज, उर्वरक, औजार आदि के लिए ऋण लेने पड़ते हैं| यही नहीं, उन्हें अपने पारिवारिक निर्वाह खर्च और शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कर्ज का ही आसरा रहता है|

3. गरीबों की ऋण आवश्यकताएँ पूरी करने में अतिलघु साख व्यवस्था की भूमिका की व्याख्या करें|

उत्तर

स्वयं सहायता समूहों (एस.एच,जी.) और गैर सरकारी संगठनों के माध्यम गरीबों को प्रदान की जाने वाली साख और वित्तीय सेवाओं को अतिलघु साख कार्यक्रम कहा जाता है| ग्रामीण परिवारों में बचत की आदतों को पैदा करके उनकी साख आवश्यकताओं को पूरा करने में स्वयं सहायता समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं| स्वयं सहायता समूहों के जरूरतमंद सदस्यों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कई किसानों की व्यक्तिगत बचत को एकत्रित किया जाता है| इस समूह के सदस्यों को बैंकों से जोड़ा गया है| दूसरे शब्दों में,स्वयं सहायता समूह (एस.एच.जी.) एक समूह के भाग के रूप में आर्थिक रूप से गरीब व्यक्ति को सशक्त बनाती है| इसके अतिरिक्त, स्वयं सहायता समूह के माध्यम से किए गए वित्तपोषण से ऋणदाताओं तथा ऋण लेने वालों के बीच लेनदेन लागत कम हो जाता है| राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक ने विशेष रियायती दरों पर साख उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है| वर्तमान में, सात लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं| इन समूहों द्वारा चलाए गए कार्यक्रम छोटे और सीमान्त ऋणदाताओं के बीच अपनी अनौपचारिक साख व्यवस्था के कारण लोकप्रिय हो रहे हैं, जिसमें न्यूनतम कानूनी औपचारिकताएँ हैं|

4. सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए गए प्रयासों की व्याख्या करें|

उत्तर

ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं:

• बाजार का नियमन: व्यवस्थित एवं पारदर्शी विपणन की दशाओं का निर्माण करने के लिए बाजार का निर्माण करना था| विपणन समिति द्वारा उत्पाद के क्रय एवं विक्रय की जाँच की जाती है जिसमें किसान, मध्यस्थ और व्यापारियों का समावेश होता है| यह मानक भार को लागू करने, शुल्कों का निर्धारण, विवादों के निपटारे में मदद करता है| इससे कृषक और उपभोक्ता दोनों ही वर्ग लाभान्वित हुए हैं|

• भौतिक आधारिक संरचनाओं का प्रावधान: सरकार ने सड़कों, रेलमार्गों, भंडारगृहों, गोदामों, शीतगृहों और प्रसंस्करण इकाईयों के रूप में भौतिक आधारिक संरचनाओं का प्रावधान किया है जो परिवहन तथा भंडारण सुविधाओं में मदद करते हैं|

• सहकारी विपणन: इसके द्वारा किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य सुलभ कराना है| सदस्य किसान सहकारी समिति को अपने अधिशेष बेचते हैं जो व्यक्तिगत सौदेबाजी के स्थान पर सामोहिक सौदेबाजी का विकल्प बनाते हैं|

• नीतिगत साधन: कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन कीमत सुनिश्चित करना, भारतीय खाद्य निगम द्वारा गेहूँ और चावल के सुरक्षित भंडार की रख रखाव और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे उपायों द्वारा किसानों को उपज के उचित दाम दिलाना तथा गरीबों को सहायिकी युक्त कीमतों पर वस्तुएँ उपलब्ध कराना रहा है|

5. आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण क्यों आवश्यक है?

उत्तर

कृषि विविधीकरण का अर्थ फसलों के उत्पादन की प्रणाली में परिवर्तन तथा श्रम शक्ति को खेती से हटाकर अन्य संबंधित कार्यों जैसे, पशुपालन, मुर्गी और मत्स्य पालन आदि तथा गैर कृषि क्षेत्र में लगाना है| यह आवश्यक है क्योंकि:

• देश में अधिकांश कृषि रोजगार खरीफ की फसल से जुड़ा रहता है किन्तु रबी की फसल के मौसम में तो जहाँ पर्याप्त सिंचाई सुविधाएँ नहीं हैं, उन क्षेत्रों में लाभप्रद रोजगार दुर्लभ हो जाता है| अतः अन्य प्रकार की उत्पादक और लाभप्रद गतिविधियों में प्रसार के माध्यम से ही हम ग्रामीण जनसमुदाय को अधिक आय कमाकर गरीबी तथा अन्य विषम परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ बना पाएँगे|

• संबद्ध गतिविधियों, गैर कृषि रोजगार, तथा नए वैकल्पिक आजीविका स्रोतों के विकास के लिए कृषि विविधीकरण की आवश्यकता है|

• बढ़ती हुई श्रम शक्ति के लिए अन्य गैर कृषि कार्यों में वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है जिसके लिए कृषि का विविधीकरण किया जाना चाहिए|

• गैर कृषि अर्थतंत्र में कुछ घटकों में पर्याप्त गतिशील अंतर्संबंध होते हैं और उनमें ‘स्वस्थ’ संवृद्धि की संभावनाएँ रहती हैं|

6. भारत के ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें|

उत्तर

भारत के ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका है| राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने ग्रामीण साख के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है| इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि संस्थागत ऋण ने किसानों को महाजनों के जाल से मुक्त कर दिया है| वहीं दूसरी ओर, संस्थागत ऋण की अनेक खामियाँ हैं| ग्रामीण एवं संस्थागत ऋण हमेशा सुरक्षा या ऋणाधार से जुड़ा हुआ होता है| नतीजतन, कई किसान इस साख का लाभ नहीं उठा सकते| इसके अतिरिक्त, व्यावसायिक बैंक किसानों के बीच बचत की आदत को बढ़ावा देने में असफल रहे हैं| सरकार द्वारा कर जमा करने की उदारता ग्रामीण बैंकिंग के मार्ग में एक और बाधा थी| इसने किसानों में कृषि ऋण का भुगतान न कर पाने की भावना को जन्म दिया| इससे कृषि ऋण का भुगतान न करने वालों की दर में वृद्धि हुई तथा ग्रामीण बैंकों में वित्तीय असुरक्षा पैदा हुई|

7. कृषि विपणन से आपका अभिप्राय है?

उत्तर

कृषि विपणन एक ऐसा तंत्र है जिसमें सामानों को विभिन्न स्थानों तक पहुँचाने का माध्यम बाजार व्यवस्था है| कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिससे देश भर में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रह, भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकिंग, वर्गीकरण और वितरण आदि किया जाता है|

8. कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ बताइए|

उत्तर

कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ निम्नलिखित हैं:

• उत्पादन बेचते समय किसानों को तोल में हेरा-फेरी तथा खातों में गड़बड़ी का सामना करना पड़ता है|

• प्रायः किसानों को बाजार में प्रचलित भावों का ज्ञान न होने पर कम कीमत पर माल बेचना पड़ता है|

• किसानों के पास अपना माल रखने के लिए अच्छी भंडारण सुविधाएँ नहीं होती हैं, अतः वे अच्छे दाम मिलने तक माल की बिक्री को स्थगित नहीं रख पाते|

• कभी-कभी किसान कृषि साख का लाभ नहीं उठा सकते हैं, फलस्वरूप, वे महाजनों द्वारा शोषण का शिकार होते हैं|

9. कृषि विपणन की कुछ उपलब्ध वैकल्पिक माध्यमों की उदाहरण सहित चर्चा करें|

उत्तर

कृषि विपणन की कुछ उपलब्ध विभिन्न वैकल्पिक माध्यम हैं जिनके अंतर्गत किसान स्वयं ही उपभोक्ता को अपना उत्पादन बेच सकते हैं जिससे अधिक आय प्राप्त होती है| पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अपनी मंडी, पुणे की हाड़पसार मंडी, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की रायथूबाज नामक फल सब्जी मंडियाँ तथा तमिलनाडु की उझावरमंडी के कृषक बाजार, इस प्रकार से विकसित हो रहे वैकल्पिक क्रय विक्रय माध्यम के कुछ उदाहरण हैं| ये सब कुछ वैकल्पिक विपणन संरचनाओं के उदाहरण हैं| यही नहीं, अनेक राष्ट्रीय/बहुराष्ट्रीय त्वरित खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियाँ भी अब किसानों के साथ कृषि-उत्पाद की खेती के लिए उत्पादकों से अनुबंध कर रही हैं| ये किसानों को उचित बीज तथा अन्य आगत तो कराती ही हैं; उन्हें पूर्व निर्धारित कीमतों पर माल खरीदने का आश्वासन भी देती हैं| ऐसी व्यवस्था छोटे तथा सीमांत किसानों के कीमत विषयक आशंकाओं और जोखिमों का निवारण करती हैं|

10. ‘स्वर्णिम क्रांति’ तथा ‘हरित क्रांति’ में अंतर स्पष्ट करें|

उत्तर

स्वर्णिम क्रांति
हरित क्रांति
फलों, सब्जियों, कंद फसलों, फूलों आदि जैसे बागवानी फसलों के उत्पादन में तेजी से वृद्धि को स्वर्णिम क्रांति के रूप में जाना जाता है। चावल और गेहूँ के उत्पादन में वृद्धि के लिए संयुक्त रूप से HYV बीज का और उर्वरकों और विकसित सिंचाई सुविधाओं का उपयोग। खद्यान्न के उत्पादन में यह बढ़ोतरी हरित क्रांति के रूप में जानी जाती है|
इससे फल, सब्जियों, फूल, सुगंधित पौधों, मसालों आदि के उत्पादन में वृद्धि हुई| इससे खद्यान्न, खासकर चावल और गेहूँ के उत्पादन में वृद्धि हुई|
इस क्रांति के परिणामस्वरूप, भारत आम, केला, नारियल और मसालों के उत्पादन में विश्व प्रतिनिधित्व बन गया| इस क्रांति के परिणामस्वरूप, भारत गेहूँ और चावल के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया|

11. क्या सरकार द्वारा कृषि विपणन सुधार के लिए अपनाए गए विभिन्न उपाय पर्याप्त हैं? व्याख्या कीजिए|

उत्तर

सरकार ने कृषि विपणन में सुधार के लिए विभिन्न उपाय किये हैं जैसे कि बाजार का नियमन, शीत भंडारण, सड़कों, रेलवे और नीतिगत साधनों जैसे आधारिक संरचनाओं का विकास| लेकिन सरकार के विभिन्न प्रयासों के बावजूद कृषि बाजारों में ग्रामीण राजनितिक अभिजात वर्ग, बड़े व्यापारी तथा अमीर किसानों का अस्तित्व कायम है| इसके अतिरिक्त, कृषि विपणन के मार्ग में निम्नलिखित बाधाएँ हैं:

• उत्पादन बेचते समय किसानों को तोल में हेरा-फेरी तथा खातों में गड़बड़ी का सामना करना पड़ता है|

• प्रायः किसानों को बाजार में प्रचलित भावों का ज्ञान न होने पर कम कीमत पर माल बेचना पड़ता है|

• किसानों के पास अपना माल रखने के लिए अच्छी भंडारण सुविधाएँ नहीं होती हैं, अतः वे अच्छे दाम मिलने तक माल की बिक्री को स्थगित नहीं रख पाते|

• कभी-कभी किसान कृषि साख का लाभ नहीं उठा सकते हैं, फलस्वरूप, वे महाजनों द्वारा शोषण का शिकार होते हैं|

12. ग्रामीण विविधीकरण में गैर-कृषि रोजगार का महत्व समझाइए|

उत्तर

कृषि क्षेत्र पर तो पहले से ही बहुत बोझ है| अतः बढ़ती हुई श्रम शक्ति के लिए अन्य गैर-कृषि कार्यों में वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है| विविधीकरण द्वारा हम न केवल खेती से जोखिम को कम करने में सफल होंगे बल्कि ग्रामीण जन समुदाय को उत्पादक और वैकल्पिक धारणीय आजीविका के अवसर भी उपलब्ध हो पाएँगे| गैर-कृषि अर्थतंत्र में अनेक घटक होते हैं| कुछ घटकों में पर्याप्त गतिशील अंतर्संबंध होते हैं और उनमें ‘स्वस्थ’ संवृद्धि की संभावनाएँ रहती हैं, किन्तु अनेक घटक तो निम्न उत्पादकता वाले निर्वाह मात्र की व्यवस्था कर पाते हैं| गतिशील उपघटकों में कृषि-प्रसंस्करण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, चर्म उद्योग तथा पर्यटन आदि सम्मिलित है| कुछ ऐसे क्षेत्रक भी हैं जिनमें संभावनाएँ तो विद्यमान है, पर जिनके लिए संरचनात्मक सुविधाएँ तथा अन्य सहायक कार्यों का नितांत अभाव है। इस वर्ग में हम परंपरागत गृह उद्योगों को रख सकते है जैसे, मिट्टी के बर्तन बनाना, शिल्प कलाएँ, हथकरघा आदि| यद्यपि, अधिकांश ग्रामीण महिलाएँ कृषि में रोजगार प्राप्त करती हैं, जबकि पुरूष गैर-कृषि रोजगार की तलाश में हैं| किन्तु, हाल के वर्षों में ग्रामीण महिलाऐं भी गैर कृषि कार्यों की ओर अग्रसर होने लगी हैं|

13. विविधीकरण के स्रोत के रूप में पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी के महत्व पर टिप्पणी करें|

उत्तर

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विविधीकरण के स्रोत के रूप में पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी का बहुत महत्व है| पशुपालन और बागवानी का कार्य लगभग हर गाँव में किया जा सकता है जबकि मत्स्यपालन चुने हुए स्थानों पर ही किया जा सकता है| हालाँकि, इन कार्यों द्वारा किसानों को आय के वैकल्पिक स्रोत सुनिश्चित करने में मदद मिलती है| ये कार्य कृषि की तुलना में अधिक स्थायित्व है जिसमें एक वर्ष में सिर्फ दो प्रमुख फसलों के मौसम शामिल हैं| ‘ऑपरेशन फ्लड’ की सफलता ने यह साबित किया है कि डेयरी उद्योग किसानों को समृद्ध बनाने में सहायता कर सकता है| आज पशुपालन क्षेत्रक देश के 7 करोड़ छोटे व सीमान्त किसानों और भूमिहीन श्रमिकों को आजीविका कमाने के वैकल्पिक साधन सुलभ करा रहे हैं| इसी प्रकार, नीली क्रांति की सफलता ने मछुवारे समुदाय की स्थिति में सुधार लाने में मदद की है|

14. ‘सूचना प्रौद्योगिकी, धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान करती है|’ टिप्पणी करें|

उत्तर

सूचना प्रौद्योगिकी, धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान करती है| सकती है| सूचनाओं और उपयुक्त सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर सरकार सहज ही खाद्य असुरक्षा की आशंका वाले क्षेत्रों का समय रहते पूर्वानुमान लगा सकती है| इस तरह से, समाज ऐसी विपत्तियों की संभावनाओं को कम या पूरी तरह से समाप्त करने में भी सफल हो सकता है| कृषि क्षेत्र में तो इसके विशेष योगदान हो सकते हैँ| इस प्रौद्योगिकी द्वारा उदीयमान तकनीकों, कीमतों, मौसम तथा विभिन्न फसलों के लिए मृदा के दशाओं की उपयुक्तता की जानकारी का प्रसारण हो सकता है| अपने आप में सूचना प्रौद्योगिकी कुछ भी नहीं बदल सकती, किंतु यह समाज में सृजनात्मक संभाव्यता और उनके ज्ञान संचय के यंत्र के रूप में कार्य कर सकती है| इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े स्तर पर रोजगार के अवसरों को उत्पन्न करने की संभाव्यता भी है| इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में सूचना प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|

15. जैविक कृषि क्या है? यह धारणीय विकास को किस प्रकार बढ़ावा देती है?

उत्तर

जैविक कृषि, कृषि करने की वह पद्धति है जो पर्यावरणीय संतुलन को पुनःस्थापित करके उसका संरक्षण और संवर्धन करती है| दूसरे शब्दों में, कृषि की यह व्यवस्था जैविक आगतों के प्रयोग पर निर्भर रहती है| परंपरागत कृषि पूरी तरह से रासायनिक उर्वरकों और विषजन्य कीटनाशकों पर आधारित है जो हमारे पर्यावरणीय व्यवस्था को हानि पहुँचाते हैं| इसलिए जैविक कृषि उपभोक्ताओं को विषाक्त रसायनों से मुक्त उत्पाद उपलब्ध कराता है, साथ ही मृदा की उर्वरता बनाये रखने तथा पारिस्थितिकी संतुलन में योगदान देता है| इस प्रकार की कृषि पर्यावरण के अनुकूल, धारणीय आर्थिक विकास को सक्षम बनाती है|

16. जैविक कृषि के लाभ व सीमाएँ स्पष्ट करें|

उत्तर

जैविक कृषि के निम्नलिखित लाभ हैं:
• जैविक कृषि महँगे आगतों (संकर बीजों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशको) के स्थान पर स्थानीय रूप से बने जैविक आगतों के प्रयोग पर निर्भर होती है| ये आगत सस्ते होते हैं और इसी कारण इन पर निवेश से प्रतिफल अधिक मिलता है|
• रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मृदा की उर्वरता का क्षरण होता है| जैसा कि जैविक कृषि में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नहीं होता है तथा इस कृषि में मृदा की उर्वरता को कम किए बिना उपभोक्ताओं के लिए गैर-विषाक्त खाद्य का उत्पादन किया जाता है|
• रासायनिक आगतों से उत्पादित खाद्य की तुलना में जैविक विधि से उत्पादित भोज्य पदार्थों में पोषक तत्व भी अधिक होते हैं|
• जैविक कृषि में श्रम आगतों का प्रयोग परंपरागत कृषि की अपेक्षा अधिक होता है- अतः भारत जैसे देश में यह अधिक आकर्षक होगा|
• इससे निर्यात के माध्यम से आय में भी वृद्धि हो रही है क्योंकि जैविक विधि द्वारा विकसित फसलों की मांग बढ़ी है|

जैविक कृषि के निम्नलिखित सीमाएँ हैं:
• परंपरागत कृषि की तुलना में जैविक कृषि की उत्पादकता कम होती है|
• जैविक कृषि की लोकप्रियता के लिए नई विधियों का प्रयोग करने में किसानों की इच्छाशक्ति और जागरूकता आवश्यक है| कम उत्पादकता के कारण, किसानों ने जैविक कृषि पद्धति अपनाने की पहल की कमी की|
• अपर्याप्त आधारिक संरचना तथा विपणन की समस्या ऐसी कुछ बाधाएँ हैं जो जैविक कृषि बढ़ावा देने से संबंधित हैं|
• जैविक कृषि की उत्पादकता रासायनिक कृषि से कम रहती है| अतः बहुत बड़े स्तर पर छोटे और सीमान्त किसानों के लिए इसे अपनाना कठिन होगा|

17. जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारंभिक वर्षों में किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

उत्तर

प्रारंभिक वर्षों में, जैविक कृषि की उत्पादकता रासायनिक कृषि से कम रहती है| अतः बहुत बड़े स्तर पर छोटे और सीमान्त किसानों के लिए इसे अपनाना कठिन होगा| यही नहीं, जैविक उत्पादों के रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा शीघ्र ख़राब होने की संभावना रहती है| बे-मौसमी फसलों का जैविक कृषि में उत्पादन बहुत सीमित होता है| प्रारंभिक वर्षों में इन कमियों के बावजूद भारत ने श्रम-गहन तकनीकों के कारण जैविक कृषि में तुलनात्मक लाभ प्राप्त किया है| इसलिए, भारत में श्रम की प्रचुर उपलब्धता के कारण जैविक कृषि लोकप्रिय हुई है|

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