NCERT Solutions for Class 11th: पाठ 2 - भारतीय अर्थव्यवस्था 1950-1990

NCERT Solutions for Class 11th: पाठ 2 - भारतीय अर्थव्यवस्था 1950-1990 (Bhartiya Arthvyavastha 1950-1990) Bhartiya Arthvyvastha ka Vikash

अभ्यास

पृष्ठ संख्या: 34

1. योजना की परिभाषा दीजिए|

उत्तर

योजना इसकी व्याख्या करती है कि किसी देश के संसाधनों का प्रयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए| योजना के कुछ सामान्य तथा कुछ विशेष उद्देश्य होते हैं, जिनको एक निर्दिष्ट समयावधि में प्राप्त करना होता है|

2. भारत ने योजना को क्यों चुना?

उत्तर

स्वतंत्रता के समय, भारतीय अर्थव्यवस्था अपने सबसे खराब अवस्था में थी| सकल घरेलू उत्पाद, राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय बहुत कम थी और बेरोजगारी बहुत अधिक थी| औद्योगिक विकास नगण्य था, कृषि क्षेत्र की स्थिति भी ठीक नहीं थी| संसाधन सीमित थे| इसलिए, भारत ने योजना को चुना क्योंकि इससे यह पता चलता है कि राष्ट्र में उपलब्ध संसाधनों का कुशलतापूर्वक और आर्थिक रूप में कैसे उपयोग किया जाए ताकि आर्थिक विकास की दर को गति प्रदान किया जाए|

3. योजनाओं के लक्ष्य क्या होने चाहिए?

उत्तर

योजनाओं के निम्नलिखित लक्ष्य होने चाहिए: संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता| सीमित संसाधनों के कारण प्रत्येक योजना में ऐसे लक्ष्यों का चयन करना पड़ता है, जिनको प्राथमिकता दी जानी है| योजनाकारों को यह सुनिश्चित करना होता है कि जहाँ तक संभव हो, चारों उद्देश्यों में कोई अंतर्विरोध न हो|

4. चमत्कारी बीज क्या होते हैं?

उत्तर

चमत्कारी बीज या उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीज (HYV) खाद्यान्न के उत्पादन में वृद्धि लाने में सहायक होते हैं| इन बीजों के प्रयोग के लिए पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों, कीटनाशकों तथा निश्चित जल पूर्ति की आवश्यकता होती है|

5. विक्रय अधिशेष क्या हैं?

उत्तर

किसानों द्वारा उत्पादन का बाजार में बेचा गया अंश ही ‘विक्रय अधिशेष’ कहलाता है| 
विक्रय अधिशेष = किसानों द्वारा उत्पादित कुल कृषि उत्पादन – कृषि उत्पादन का स्वयं उपभोग

6. कृषि क्षेत्रक में लागू किये गए भूमि सुधार की आवश्यकता और उनके प्रकारों की व्याख्या कीजिए|

उत्तर

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश की भू-धारण पद्धति में जमींदार-जागीरदार आदि का वर्चस्व था| ये खेतों में कोई सुधार किये बिना, मात्र लगान की वसूली किया करते थे| कृषि में समानता लाने के लिए भू-सुधारों की आवश्यकता हुई, जिसका मुख्य ध्येय जोतों के स्वामित्व में परिवर्तन करना था| 
भूमि सुधार के प्रकार:

• मध्यस्थों की समाप्ति: भू-सुधार का मुख्य केंद्र बिंदु मध्यस्थों जैसे जमींदार, जागीरदार की समाप्ति किया जाना था| इसके अंतर्गत वास्तविक कृषकों को ही भूमि का स्वामी बनाने जैसे कदम उठाये गए| इसका उद्देश्य यह था कि भूमि का स्वामित्व किसानों को निवेश करने की प्रेरणा देगा, बशर्तें उन्हें पर्याप्त पूँजी उपलब्ध कराई जाए| 

• जोतों की चकबंदी: स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भूमि के जोत छोटे और विखंडित थे, इसलिए आधुनिक और उन्नत तकनीक के उपयोग के लिए जोतों की चकबंदी आवश्यक थी| किसानों को उनके विभिन्न खंडित भूखंडों के बराबर संगठित रूप से भूमि में हिस्सेदारी दी गई| इससे बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादन से जुड़े लाभों को सक्षम किया गया|

• भूमि की अधिकतम सीमा का निर्धारण: इसका अर्थ है- किसी व्यक्ति की कृषि भूमि के स्वामित्व की अधिकतम सीमा का निर्धारण करना| इस नीति का उद्देश्य कुछ लोगों में भू-स्वामित्व के संकेन्द्रण को कम करना था| 

7. हरित क्रांति क्या है? इसे क्यों लागू किया गया और इससे किसानों को कैसे लाभ पहुँचा? संक्षेप में व्याख्या कीजिए|

उत्तर

हरित क्रांति का तात्पर्य उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV) के प्रयोग से है, विशेषकर गेहूँ तथा चावल उत्पादन में वृद्धि से|
इसे इसलिए लागू किया गया क्योंकि स्वतंत्रता के समय देश की 75 प्रतिशत जनसँख्या कृषि पर आधारित थी| इस क्षेत्रक में उत्पादकता बहुत ही कम थी, क्योंकि पुरानी प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता था और अधिसंख्य किसानों के पास आधारिक संरचना का भी नितांत अभाव था| भारत की कृषि मानसून पर निर्भर है| यदि मानसून स्तर कम होता था तो किसानों को कठिनाई होती थी, क्योंकि उन्हें सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध न थीं| यह सुविधा कुछ ही किसानों के पास थी| 
उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV) के प्रयोग से खाद्यान्न के उत्पादन में उल्लेखनीय रूप से वृद्धि हुई है तथा हरित क्रांति काल में किसानों द्वारा गेहूँ तथा चावल के अतिरिक्त उत्पादन का अच्छा खासा भाग बाजार में बेचा गया था| भारत ने अनाज में आत्म-निर्भरता तथा आत्म-विश्वसनीयता प्राप्त की है| 

8. योजना उद्देश्य के रूप में ‘समानता के साथ संवृद्धि’ की व्याख्या कीजिए|

उत्तर

केवल संवृद्धि द्वारा ही जनसामान्य के जीवन में सुधार नहीं आ सकता| किसी देश में उच्च संवृद्धि दर और विकसित अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग होने के बाद भी अधिकांश लोग गरीब हो सकते हैं| यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आर्थिक समृद्धि के लाभ देश के निर्धन वर्ग को भी सुलभ हो, केवल धनी लोगों तक ही सीमित न रहे| अत: संवृद्धि, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के साथ-साथ  समानता भी महत्त्वपूर्ण है: प्रत्येक भारतीय को भोजन, अच्छा आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर पाने में समर्थ होना चाहिए और धन संपति के वितरण की असमानताएँ भी कम होनी चाहिए| हमारी योजना का यही उद्देश्य होना चाहिए|

पृष्ठ संख्या: 35

9. ‘क्या रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास पैदा करता है?’ व्याख्या कीजिए|

उत्तर

नहीं, रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास पैदा नहीं करता है| बल्कि, आधुनिकीकरण तथा रोगगार सृजन दोनों सकारात्मक रूप से संबंधित हैं| नई प्रौद्योगिकी को अपनाकर वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन को बढ़ाना ही आधुनिकीकरण है| उदाहरण के लिए, किसान पुराने बीजों के स्थान पर नई किस्म के बीजों का प्रयोग कर खेतों की पैदावार बढ़ा सकता है| उसी प्रकार, एक फैक्ट्री नई मशीनों का प्रयोग कर उत्पादन बढ़ा सकती है| इससे रोजगार सृजन के अवसरों में कटौती नहीं होता बल्कि यह श्रमशक्ति को बढ़ावा देता है| जरूरत इस बात की होती है कि मानव संसाधन का प्रशिक्षण हो|
आधुनिक तकनीक तथा यंत्र का प्रयोग उत्पादकता को बढ़ाएगा और परिणामस्वरूप, लोगों की आय बढ़ने से वस्तुओं और सेवाओं के माँग में भी वृद्धि होगी| इस बढती माँग की पूर्ति के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे| अधिक से अधिक लोगों की नियुक्ति होगी तथा रोजगार सृजन के अवसर में भी वृद्धि होगी| इस प्रकार, आधुनिकीकरण और रोजगार सृजन दोनों विरोधाभास नहीं बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं|

10. भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना क्यों आवश्यक था?

उत्तर

भारत जैसे विकासशील देश नियोजन उद्देश्य के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना आवश्यक था| इस नीति को, विशेषकर खाद्यान्न के लिए अन्य देशों पर निर्भरता कम करने के लिए आवश्यक समझा गया| यह भी आशंका थी कि आयातित खाद्यान्न, विदेशी प्रौद्योगिकी और पूँजी पर निर्भरता किसी न किसी रूप में हमारे देश की नीतियों में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ाकर हमारी संप्रुभता में बाधा डाल सकती थी| 

11. किसी अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन क्या होता है? क्या यह आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था के जी.डी.पी. में सेवा क्षेत्रक को सबसे अधिक योगदान करना चाहिए? टिप्पणी करें|

उत्तर

देश का सकल घरेलू उत्पाद देश की अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों से प्राप्त होता है| ये क्षेत्रक हैं- कृषि क्षेत्रक, औद्योगिक क्षेत्रक और सेवा क्षेत्रक| इन क्षेत्रकों के योगदान से ही अर्थव्यवस्था का ढाँचा तैयार होता है|
हाँ, यह आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था के जी.डी.पी. में सेवा क्षेत्रक को सबसे अधिक योगदान करना चाहिए| इस घटना को संरचनात्मक परिवर्तन कहते हैं| विकास के साथ कृषि क्षेत्रक का योगदान कम तथा औद्योगिक क्षेत्रक का योगदान प्रमुख होता जाता है| विकास के उच्च स्तर पर, सेवा क्षेत्रक का योगदान दो अन्य क्षेत्रों से अधिक हो जाता है| यह विश्व के विकसित अर्थव्यवस्था में देखा गया है| 

12. योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक को ही अग्रणी भूमिका क्यों सौंपी गई थी?

उत्तर

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जिसमें उद्योगपतियों के पास हमारी अर्थव्यवस्था के विकास हेतु उद्योगों में निवेश करने के लिए अपेक्षित पूँजी नहीं थी और इतना बड़ा बाजार भी नहीं था, जिसमें उन्हें मुख्य परियोजनाएँ शुरू करने के लिए प्रोत्साहन मिलता| यद्यपि उनके पास ऐसा करने के लिए पूँजी भी थी| इन्हीं कारणों से राज्य को औद्योगिक क्षेत्र को प्रोत्साहन देने में व्यापक भूमिका निभानी पड़ी| इसके अतिरिक्त, भारतीय अर्थव्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने के लिए योजना में यह निर्णय लिया गया कि सरकार अर्थव्यवस्था में बड़े तथा भारी उद्योगों का नियंत्रण करेगी| 

13. इस कथन की व्याख्या करें: ‘हरित क्रांति ने सरकार को खाद्यान्नों के प्रापण द्वारा विशाल सुरक्षित भण्डार बनाने के योग्य बनाया, ताकि वह कमी के समय उसका उपयोग कर सके’| 

उत्तर

हरित क्रांति के कारण खद्यान्न के उत्पादन में वृद्धि हुई| आधुनिक तकनीक के प्रयोग, उर्वरक, कीटनाशकों तथा HYV बीजों के व्यापक उपयोग से कृषि उत्पदकता तथा प्रति कृषि भूमि उत्पादन में वृद्धि हुई है| इसके अतिरिक्त बाजार व्यवस्था के विस्तार, मध्यस्थों की समाप्ति तथा ऋणों की सरल उपलब्धता किसानों को विक्रय अधिशेष प्राप्त करने में सक्षम बनाया है| इन कारणों से सरकार पर्याप्त खद्यान्न प्राप्त कर सुरक्षित स्टॉक बना सकी जिसे खाद्यान्नों की कमी के समय प्रयोग किया जा सकता है| 

14. सहायिकी किसानों को नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग करने को प्रोत्साहित तो करती है पर उसका सरकारी वित्त पर भारी बोझ पड़ता है| इस तथ्य को ध्यान में रखकर सहायिकी की उपयोगिता पर चर्चा करें|

उत्तर

किसान  प्राय: किसी भी नईं प्रौद्योगिकी को जोखिम पूर्ण समझते है| अत: किसानों द्वारा नई प्रौद्योगिकी को परख के लिये सहायिकी आवश्यक थी| कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि एक बार प्रौद्योगिकी का लाभ मिल जाने तथा उसके व्यापक प्रचलन के बद सहायिकी धीरे—धीरे समाप्त कर देनी चाहिए, क्योकि उनका उद्देश्य पूरा हो गया है| यही नहीं, यद्यपि सहायिकी का ध्येय तो किसानों को लाभ पहुँचाना है, किंतु उर्वरक-सहायिकी का लाभ बड़ी मात्रा में प्राय: उर्वरक उद्योग तथा अधिक समृद्ध क्षेत्र के किसानों को ही पहुँचता है| अत: यह तर्क दिया जाता है कि उर्वरकों पर सहायिकी जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है| इनसे लक्षित समूह को लाभ नहीं होता और सरकारी कोष पर अनावश्यक भारी बोझ पड़ता है| दूसरी और कुछ विशेषज्ञ का मत है कि सरकार को कृषि-सहायिकी जारी रखनी चाहिए, क्योंकि भारत में कृषि एक बहुत ही जोखिम भरा व्यवसाय है| अधिकांश किसान बहुत गरीब है और सहायिकी को समाप्त करने से वे अपेक्षित आगतों का प्रयोग नहीं कर पाएँगे| सहायिकी समाप्त करने से गरीब और अमीर किसानों के बीच असमानता और बढ़ेगी तथा समता के लक्ष्य का उल्लंघन होगा| इन विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि सहायिकी से बड़े-किसानों तथा उर्वरक उद्योग को अधिक लाभ हो रहा है, तो सही नीति सहायिकी समाप्त करना नहीं बल्कि ऐसे कदम उठाना है जिनसे कि केवल निर्धन किसानों को ही इनका लाभ मिले|

15. हरित क्रांति के बाद भी 1990 तक हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्रक में ही क्यों लगी रही?

उत्तर

भारत में 1950-90 की अवधि में यद्यपि जी.डी.पी. में कृषि के अंशदान में तो भारी कमी आई है, पर कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात में नहीं (जो 1950 में 67.50 प्रतिशत थी और 1990 तक घटकर 64.9 प्रतिशत ही हो पाई)| इस क्षेत्रक में इतनी उत्पादन वृद्धि तो न्यूनतम श्रम के प्रयोग द्वारा भी संभव थी, फिर इस क्षेत्रक में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लगे रहने की क्या आवश्यकता थी? इसका उत्तर यही है कि उद्योग क्षेत्रक और सेवा क्षेत्रक, कृषि क्षेत्रक में काम करने वाले लोगों को नहीं खपा पाए| अनेक अर्थशास्त्री इसे 1950-90 के दौरान अपनाई गई नीतियों की विफलता मानते हैं|

16. यद्यपि उद्योगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्रक बहुत आवश्यक रहा है, पर सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उपक्रम ऐसे हैं जो भारी हानि उठा रहे हैं और इस क्षेत्रक के अर्थव्यवस्था के संसाधनों की बर्बादी के साधन बने हुए हैं| इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक क्षेत्रक के उपक्रमों की उपयोगिता पर चर्चा करें|

उत्तर

यद्यपि सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उपक्रम ऐसे हैं जो भारी हानि उठा रहे हैं किन्तु ये क्षेत्र महत्वपूर्ण मामलों तथा हानिकारक रसायनों के क्षेत्र में उपयोगी रहे हैं| इनकी उपयोगिताएँ निम्नलिखित हैं:

• राष्ट्र के कल्याण को बढ़ावा: सार्वजनिक क्षेत्र का प्रमुख उद्देश्य ऐसी वस्तुएँ एवं सेवाओं का उत्पादन करना है जो देश के कल्याण में शामिल हों| उदाहरण के लिए, विद्यालय, अस्पताल, बिजली आदि| ये सेवाएँ न केवल राष्ट्र के कल्याण को बढ़ावा देती हैं बल्कि आर्थिक विकास एवं संवृद्धि की संभावनाओं को भी बढाती हैं| 

• दीर्घकालिक निर्माण योजनाएँ: निजी क्षेत्र आधारभूत उद्योगों तथा बिजली, रेलवे, सड़कों आदि जैसे बड़े और व्यापक परियोजनाओं में निवेश करने के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है| ऐसा इसलिए है क्योंकि इन परियोजनाओं में बड़ी मात्रा में पूँजी तथा निर्माण काल की अवधि लंबी लगती है| इस प्रकार सार्वजनिक क्षेत्र इन परियोजनाओं में निवेश करने के लिए सबसे उपयुक्त है| 

• आधारभूत ढाँचा: प्रारंभिक पंचवर्षीय योजनाओं की महत्वपूर्ण विचारधारा यह थी कि सार्वजनिक क्षेत्र को औद्योगीकरण का आधारभूत ढाँचा बनाना चाहिए ताकि औद्योगीकरण के बाद के चरण में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलेगा|

• समाजवादी विचारधारा: स्वतंत्रता के शुरूआती वर्षों में, भारतीय योजनाकारों तथा विचारकों ने समाजवादी स्वरुप या ढाँचा को अपनाया| यह तर्कसंगत था, कि यदि सरकार उत्पादन साधनों और उत्पादन को नियंत्रित करती है, तो यह देश के विकास के मार्ग को बाधित नहीं करेगी| यह सार्वजनिक उपक्रमों के स्थापना का मूल उद्देश्य था| ये राष्ट्र की सामाजिक आवश्यकताओं तथा आर्थिक कल्याण के अनुसार कार्य करती हैं|

• आय की असमनाता को कम तथा रोजगार के अवसर प्रदान करना: यह माना गया था कि अर्थव्यवस्था में आय की असमानताओं को कम करने, गरीबी उन्मूलन तथा जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए सरकारी क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के माध्यम से निवेश करना चाहिए|   

17. आयात प्रतिस्थापन किस प्रकार घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करता है?

उत्तर

अंतर्मुखी व्यापार नीति के अंतर्गत अपनाई गई नीति आयात प्रतिस्थापन कहलाती है जिसमें उन वस्तुओं के आयात पर रोक लगाया जाता है जिसका घरेलू स्तर पर उत्पादन किया जा सकता है| आयात प्रतिस्थापन नीति विदेशी वस्तुओं पर अर्थव्यवस्था के निर्भरता कम ही नहीं करती बल्कि घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहित भी देती है| घरेलू उद्योगों को आयातित वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए सरकार विभिन्न वित्तीय प्रोत्साहन तथा लाइसेंस प्रदान करती है| इससे न केवल घरेलू उद्योगों को स्थिरता बनाये रखने में सहयता मिलेगी बल्कि विदेशी प्रतिस्पर्धा से रक्षा भी करेगी| लाइसेंस के रूप में बाजार में हिस्सेदारी उन्हें घरेलू बाजार में एकाधिकार का दर्जा देती है| एकाधिकार होने के कारण, उन्हें अधिक लाभ की प्राप्ति होती है| इस प्रकार यदि घरेलू उद्योगों का संरक्षण किया जाता है, तो समय के साथ वे प्रतिस्पर्धा करना सीख लेते हैं| 

18. औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 में निजी क्षेत्रक का नियमन क्यों और कैसे किया गया था?

उत्तर

औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 के अंतर्गत निजी क्षेत्रक को लाइसेंस पद्धति के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा गया| नए उद्योगों को तब तक अनुमति नहीं दी जाती थी, जब तक सरकार से लाइसेंस नहीं प्राप्त कर लिया जाता था| इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया| यदि उद्योग आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में लगाये गए, तो लाइसेंस प्राप्त करना आसान था| इसके अतिरिक्त, उन इकाईयों को कुछ रियायतें जैसे, कर लाभ तथा कम प्रशुल्क पर बिजली दी गई| इस नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय समानता को बढ़ावा देना था| 
वर्तमान उद्योग को भी उत्पादन बढ़ाने या विविध प्रकार के उत्पादन करने के लिए लाइसेंस प्राप्त करना होता था| इसका अर्थ यह सुनिश्चित करना था कि उत्पादित व्स्तुओं की मात्रा अर्थव्यवस्था द्वारा अपेक्षित मात्रा से अधिक न हो|

19. निम्नलिखित युग्मों को सुमेलित कीजिए|

1. प्रधानमंत्री (क) अधिक अनुपात में उत्पादन देने वाले बीज|
2. सकल घरेलू उत्पाद (ख) आयात की जा सकने वाली मात्रा|
3. कोटा (ग) योजना आयोग के अध्यक्ष
4. भूमि-सुधार (घ) किसी अर्थव्यवस्था में एक वर्ष में उत्पादित की गई सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य|
5. उच्च उत्पादकता वाले बीज (ङ) कृषि क्षेत्र की उत्पादकता वृद्धि के लिए किए गए सुधार|  
6. सहायिकी (च) उत्पादक कार्यों के लिए सरकार द्वारा दी गई मौद्रिक सहयता|

उत्तर

1. प्रधानमंत्री (क) अधिक अनुपात में उत्पादन देने वाले बीज|
2. सकल घरेलू उत्पाद (ख) आयात की जा सकने वाली मात्रा|
3. कोटा (ग) योजना आयोग के अध्यक्ष
4. भूमि-सुधार (घ) किसी अर्थव्यवस्था में एक वर्ष में उत्पादित की गई सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य|
5. उच्च उत्पादकता वाले बीज (ङ) कृषि क्षेत्र की उत्पादकता वृद्धि के लिए किए गए सुधार|  
6. सहायिकी (च) उत्पादक कार्यों के लिए सरकार द्वारा दी गई मौद्रिक सहयता|

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